रात के समय सुनसान सड़क पर बाइक से डिलीवरी करता एक युवक, मेहनत और जिम्मेदारी को दर्शाता दृश्य।

डिलीवरी बॉय

जब हम आराम से घर में होते हैं, तब भी कोई हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए सड़कों पर होता है। यह लेख डिलीवरी बॉय के संघर्ष, मेहनत और समर्पण की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है।

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…वजूद

कभी-कभी एक साधारण-सी बातचीत हमें किसी भूली-बिसरी सच्चाई से रूबरू करवा देती है। यह कहानी भी ऐसी ही एक स्त्री की है — एक पढ़ी-लिखी बंजारन, जो विवाह के बाद घर-परिवार और खेतों की ज़िम्मेदारियों में इस कदर उलझी कि अपने अस्तित्व का ख्याल रखना ही भूल गई। उसकी सारी सोच अपने बच्चों के भविष्य और परिवार की सेवा में समर्पित रही। हमेशा डरती रही — “मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा?” और फिर वही डर सच हो गया।

उसके जाने के बाद, जिस परिवार के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगाया था, उन्होंने जल्दी ही उसका स्थान भर दिया — दूसरी शादी, आया की व्यवस्था, और जीवन फिर से पटरी पर। और आया भी, जो सबका ख्याल रखते-रखते खुद बीमार होकर चल बसी… उसके बाद भी जीवन नहीं रुका।

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खुद से प्यार: एक छोटी शुरुआत, एक बड़ी मुस्कान

हम अक्सर दूसरों को खुश करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि खुद से प्यार करना भूल जाते हैं। लेकिन असली सुकून तब मिलता है जब हम खुद को अपना फेवरेट बना लेते हैं। खुद से बात करना, अपने साथ समय बिताना, और खुद को समझना – यही तो है सच्चा प्यार। क्योंकि जब आप खुद से प्यार करेंगे, तभी दुनिया भी आपको उसी नजर से देखेगी।

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“रिश्तों की श्वास: विश्वास”

जिस प्रकार जीवन के लिए श्वास लेना आवश्यक है, उसी प्रकार रिश्तों को जीवित रखने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। यदि रिश्तों में शक, झूठ और अवसाद जैसी अशुद्ध वायु भर जाए, तो उनका दम घुटने लगता है। ऐसे में जरूरी है कि हम स्वयं सकारात्मक रहें और अपने रिश्तों को विश्वास की स्वच्छ हवा प्रदान करें, क्योंकि इन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी हमारी ही है – किसी और की नहीं।

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जिसके सिर पर छांव नहीं थी… वो खुद सूरज बन गया”

फादर्स डे पर बच्चों ने मुझे बधाई दी, लेकिन मैं अपने पिता को कभी ‘हैप्पी फादर्स डे’ नहीं कह पाया। क्योंकि वो होते हुए भी कभी पिता जैसे नहीं रहे। ठोकरें लगीं, खुद ही संभला, खुद ही सीखा… शायद इसी में ज़िंदगी की असली सीख थी।”

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