
डॉ. रुपाली गर्ग , मुंबई
प्रेषक:
अनाम (एक बेचैन मन)
दिनांक: 6 अप्रैल 2026
प्राप्तकर्ता:
प्रिय स्वयं (मेरा मन)
विषय: दिल की अनकही बात
प्रिय मन,
आज पहली बार तुझसे ही बात करने बैठी हूँ। अक्सर सबको समझाने में लगी रही, पर तुझे समझने का समय ही नहीं दिया।
तू चुप रहता है, फिर भी बहुत कुछ कहता है। तेरी खामोशियों में छुपे सवाल मुझे अक्सर बेचैन कर देते हैं। कभी तू खुशियों में झूमता है, तो कभी बिना वजह उदास हो जाता है। सच कहूँ तो, मैं तुझे अब तक ठीक से जान ही नहीं पाई।
कभी-कभी अकेलापन महसूस होता है, तो कभी भविष्य को लेकर चिंता होती है। ऐसा लगता है कि ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती जा रही हैं और हम खुद को कहीं पीछे छोड़ते जा रहे हैं। पर फिर सोचती हूँ कि हर कठिनाई हमें कुछ नया सिखाने के लिए ही आती है।
क्यों हर छोटी बात दिल पर ले लेता है तू? क्यों दूसरों की उम्मीदों में खुद को भूल जाता है? शायद इसलिए कि तू सच्चा है, और सच्चाई अक्सर संवेदनशील होती है।
आज एक वादा करती हूँ अब तुझे अनदेखा नहीं करूँगी। तेरी हर खुशी और हर दर्द को समझने की कोशिश करूँगी। दुनिया चाहे कुछ भी कहे, अब मैं तेरे साथ खड़ी रहूँगी। आज मैं तुझसे एक और वादा करना चाहती हूँ. मैं फिर से कोशिश करूँगी। धीरे-धीरे सही, लेकिन तेरी ओर कदम ज़रूर बढ़ाऊँगी। अब मैं दूसरों की नहीं, अपने मन की सुनूँगी।
बस, तू भी मेरा साथ मत छोड़ना।
क्योंकि तू ही तो मेरी असली पहचान है।
चल, आज से हम दोस्त बनते हैं तू और मैं।
शायद इसी में सुकून मिल जाए।
तुम्हारी अपनी
एक अधूरी, पर उम्मीद से भरी इंसान
लेखिका के बारे में-
डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।

सच लिखा आपने