
डॉ. अनामिका दुबे निधि, मुंबई
तुम्हारा एक अरसे बाद मिल जाना यूँ ही तो नहीं,
कायनात का मुझे तुमसे मिलाना यूँ ही तो नहीं।
तुम आए तो दुखती रग को मरहम-सा मिला,
इस दिल का यूँ सँभलकर मुस्कुराना यूँ ही तो नहीं।
बरसों की ख़ामोशी टूटी एक ही आहट में,
लफ़्ज़ों का यूँ अचानक बदल जाना यूँ ही तो नहीं।
मैंने हर दुआ में तेरा नाम छुपा रखा था,
हाथों का यूँ ख़ुद-ब-ख़ुद उठ जाना यूँ ही तो नहीं।
थककर जो बैठ गई थी उम्मीद राहों में,
तेरा आकर उसे फिर से उठाना यूँ ही तो नहीं।
कुछ ज़ख़्म थे, जो वक़्त भी भर न सका,
तेरी नज़र का उन्हें भर जाना यूँ ही तो नहीं।
“निधि” ये इत्तेफ़ाक़ नहीं, इश्क़ की तहरीर है,
क़िस्मत का यूँ कहानी बन जाना यूँ ही तो नहीं।
लेखिका के बारे में-
डॉ. अनामिका दुबे “निधि”
हिंदी प्रवक्ता के रूप में 4 वर्ष तथा अध्यापिका के रूप में 2 वर्ष कार्यरत रहीं। वे “राष्ट्रीय साहित्य नवरत्न मंच” की संस्थापिका हैं और विभिन्न मंचों व FM पर काव्य पाठ कर चुकी हैं। उनकी रचनाएँ दैनिक भास्कर सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।
उन्हें वाचस्पति मानद, कलम रत्न, साहित्य संगिनी, अजातशत्रु और साहित्य प्रभा जैसे कई सम्मान प्राप्त हुए हैं।
उनकी एकल पुस्तक “मेरी भावनाएं” प्रकाशित है और वे 100+ साझा काव्य संकलनों में योगदान दे चुकी हैं।
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बेहतरीन
बहुत ही सुंदर अभिव्यक्तियां भावनात्मक और आत्मा को छू जाने वाले शब्दों का शानदार उपयोग आपकी कलम और कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है सरस्वती की कृपा आप पर बनी रहे,,
बहुत बहुत सुन्दर 👌👌👌👌
पंक्तियां शानदार,
किसी की यादों को चूरा जाना यूं ही तो नहीं