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आईने के सामने खड़ी एक महिला, जो अपने भीतर के विभिन्न भावों को महसूस कर रही है

मैं मुझमें, मुझमें मैं

“मैं ही उजाला, मैं ही अँधेरा हूँ, मैं ही ख़ुशी, मैं ही दुःख हूँ…”जब इंसान खुद को पूरी तरह स्वीकार कर लेता है,तो उसे किसी और की ज़रूरत नहीं रह जाती. वह खुद में ही एक पूरी दुनिया बन जाता है।

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ख़त अपने नाम…

आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।

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