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…वजूद


कल किसी से बात करते-करते एक कहानी याद आ गई. कितने वर्षों पुरानी बात है, ये तो याद नहीं मगर जब ये कहानी याद आई तो सच भी झूठ-सा लगने लगा.
एक महिला थी बंजारन थी. उस ज़माने में भी पढ़ी-लिखी, समझदार. मगर शादी के बाद घर, परिवार और बच्चों ने उसे कहीं का न छोड़ा. सास-ससुर, पति, तीन बच्चे और ऊपर से खेतों की ज़िम्मेदारी इतनी ज़िम्मेदारियों में वो अपने बारे में सोच ही नहीं पाती थी.
अक्सर सोचती रहती….मुझे कुछ हो गया तो मेरे बच्चों का क्या होगा?
और फिर एक दिन, उसे सच में कुछ हो गया.
उस दौर की लाइलाज बीमारी ने उसे छीन लिया और वो इस दुनिया से चल बसी.उसके जाते ही पति ने दूसरी शादी कर ली. सास-ससुर और बच्चों की देखभाल के लिए एक आया रखी गई. वह आया सबका ख्याल रखते-रखते खुद बीमार पड़ गई और फिर वो भी चल बसी.
उसके जाते ही, सबने एक और नया इंतज़ाम कर लिया और ज़िंदगी चलती रही. सोचने की बात यह है एक पूरी उम्र जो हम सोचते हैं क्या होगा? उस सोच में हम स्त्रियाँ खुद के वजूद, अपने स्वास्थ्य और अपनी खुशियों को खो देती हैं.

खुशी झा, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

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