प्रतिभा से डरता समाज, चरित्र पर उठाता सवाल !
एक स्त्री जब मेहनत, प्रतिभा और संघर्ष से अपनी पहचान बनाती है, तो उसकी उपलब्धियों के बजाय उसके चरित्र पर सवाल क्यों उठते हैं? यह लेख इसी सामाजिक मानसिकता और प्रतिभावान स्त्री की मनोव्यथा को सामने रखता है।

एक स्त्री जब मेहनत, प्रतिभा और संघर्ष से अपनी पहचान बनाती है, तो उसकी उपलब्धियों के बजाय उसके चरित्र पर सवाल क्यों उठते हैं? यह लेख इसी सामाजिक मानसिकता और प्रतिभावान स्त्री की मनोव्यथा को सामने रखता है।
कभी-कभी एक साधारण-सी बातचीत हमें किसी भूली-बिसरी सच्चाई से रूबरू करवा देती है। यह कहानी भी ऐसी ही एक स्त्री की है — एक पढ़ी-लिखी बंजारन, जो विवाह के बाद घर-परिवार और खेतों की ज़िम्मेदारियों में इस कदर उलझी कि अपने अस्तित्व का ख्याल रखना ही भूल गई। उसकी सारी सोच अपने बच्चों के भविष्य और परिवार की सेवा में समर्पित रही। हमेशा डरती रही — “मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा?” और फिर वही डर सच हो गया।
उसके जाने के बाद, जिस परिवार के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगाया था, उन्होंने जल्दी ही उसका स्थान भर दिया — दूसरी शादी, आया की व्यवस्था, और जीवन फिर से पटरी पर। और आया भी, जो सबका ख्याल रखते-रखते खुद बीमार होकर चल बसी… उसके बाद भी जीवन नहीं रुका।
चरित्र की व्याख्या समाज ने हमेशा अपने दृष्टिकोण से की है – पुरुष का चरित्र उस पन्नी जैसा है जो टपकती हुई छत पर बांध दी जाती है। चाहे वह कितनी भी मैली हो जाए, वह दीवारों को सीलन से बचाने का काम करती रहती है – बिना कोई प्रश्न किए, बिना कोई उंगली उठाए, बस चुपचाप अपना दायित्व निभाती है।
औरत का चरित्र उस घर की देहरी है, जिसे चाहे जितना भी अल्पना से सजा लिया जाए, उसे पांव मारकर मटियामेट करने का जन्मसिद्ध अधिकार हर किसी को प्राप्त होता है – घर के अंदर वाले को भी और बाहर वाले को भी।
पुरुषों का चरित्र पुरुषों से सदैव सुरक्षित रहता है। वे आपस में महफिलें सजाते हैं, एक-दूसरे की चुप्पियों का सम्मान करते हैं, और “तेरी भी चुप, मेरी भी चुप” के सिद्धांत पर चलते हुए सहजता से जीवन का आनंद लेते हैं।