चरित्र …

  1. पुरूष का चरित्र
    टपकती हुई छत पर
    बंधी हुई पन्नी है
    कितनी भी मैली हो जाये
    सीलन से बचती-बचाती , सुबकती दीवारें
    न प्रश्न करती हैं ,न उंगली उठाती हैं…

2. औरत का चरित्र
घर की देहरी है
कितना भी अल्पना से सजा ले
पांव मारकर मटियामेट करने का
जन्मसिद्ध अधिकार घरवाले -बाहर वाले
सबके पास होता है…

3. पुरूष का चरित्र
पुरूषों से हमेशा सुरक्षित रहा
साथ मिल बैठ महफिलें सजाने वाले
“तेरी भी चुप_मेरी भी चुप” के सीधे -सपाट
रास्ते पर चलते हुए रास्ते का आनंद लेते रहे…

4. औरतें चरित्र प्रमाण-पत्र बांटने के
चलते फिरते छापाखाने की अवैतनिक मजदूरिनें थीं
चौबीस घंटे, बारहमासा
प्रमाण -पत्र पर थप्पा लगाने में बिचारी
इतनी व्यस्त रहीं कि अपने गिरेबान में
झांकने का मौका ही नहीं मिला
बस इतना भर गुज़ारा भत्ता मिला कि
उनके अंहम की रोजी-रोटी का गुजारा होता रहा …

5. सबसे बड़ा धोखा था
विद्यालय से मिला चरित्र प्रमाण-पत्र
जिस पर झूठ लिखा था
“आपका चरित्र सर्वश्रेष्ठ है , विद्यालय आपके
उज्जवल भविष्य की कामना करता है “
ज़िन्दगी के महाविद्यालय में
उज्जवल भविष्य से कुछ इतने भयभीत रहे
कि निशाने पर सबसे सुलभ -सरल शिकार
हमेशा चरित्र रहा.

संध्या यादव, वरिष्ठ साहित्यकार व शिक्षिका, मुंबई

5 thoughts on “चरित्र …

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    – सुरेश परिहार

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