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चरित्र …

चरित्र की व्याख्या समाज ने हमेशा अपने दृष्टिकोण से की है – पुरुष का चरित्र उस पन्नी जैसा है जो टपकती हुई छत पर बांध दी जाती है। चाहे वह कितनी भी मैली हो जाए, वह दीवारों को सीलन से बचाने का काम करती रहती है – बिना कोई प्रश्न किए, बिना कोई उंगली उठाए, बस चुपचाप अपना दायित्व निभाती है।

औरत का चरित्र उस घर की देहरी है, जिसे चाहे जितना भी अल्पना से सजा लिया जाए, उसे पांव मारकर मटियामेट करने का जन्मसिद्ध अधिकार हर किसी को प्राप्त होता है – घर के अंदर वाले को भी और बाहर वाले को भी।

पुरुषों का चरित्र पुरुषों से सदैव सुरक्षित रहता है। वे आपस में महफिलें सजाते हैं, एक-दूसरे की चुप्पियों का सम्मान करते हैं, और “तेरी भी चुप, मेरी भी चुप” के सिद्धांत पर चलते हुए सहजता से जीवन का आनंद लेते हैं।

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