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इंसानियत…

मुंबई बाढ़ का वो दिन मेरे लिए हमेशा के लिए यादगार बन गया. दोपहर बारह बजे से शाम पांच बजे तक मैं कुर्ला और सायन के बीच फँसी रही, फिर भी घर पहुँचने के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे थे.
ट्रेन में बैठते ही लगा कि यह तो आम बरसात है, क्योंकि ट्रेन सामान्य गति से चल रही थी. लेकिन विद्याविहार के बाद जैसे ही ट्रेन रुकी, परेशानियाँ शुरू हो गईं. कुर्ला पहुँचने में आधा घंटा लग गया और वहाँ से थोड़ी देर चलकर ट्रेन फिर आऊटर पर रुक गई और बस वहीं अटक गई.
घड़ी के काँटे घूमते रहे, एक… दो… तीन… चार… पाँच बज गए. बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी.
कंपार्टमेंट में पहले तो सब सामान्य थे, किसी को अंदाज़ा नहीं था कि परेशानी इतनी लंबी खिंच सकती है. धीरे-धीरे लोगों ने घर और ऑफिस में खबर दे दी कि ट्रेन में फँसे हैं, देर हो सकती है.
कुछ उत्साही लोग ट्रैक पर चलकर निकलते दिखे, पर खासकर महिलाओं ने ऐसा जोखिम उठाना ठीक नहीं समझा. नीचे पानी भरा था और एक बड़ा गड्ढा भी था जिसमें कुछ लोग गिरते दिखे. पहले तो चिंता हुई, फिर कुछ ने हँसी भी बना ली. मुसीबत में भी लोग हँसी ढूँढ ही लेते हैं.
सभी ट्रेन में रहना ही बेहतर समझने लगे. इस भीड़ में एक 15 वर्षीय लड़की भी थी छोटी कद की, सांवली, मगर काफी समझदार. थोड़ी ही देर में वो हम सबसे घुलमिल गई.
वो हँसी भी, गड्ढे में गिरते लोगों को देखकर, और साथ ही साथ भीगती भी रही. बाहर की हालत देखकर लोगों ने सफाई, प्लास्टिक, और हमारी आदतों पर चर्चा शुरू की.
तभी भूख लगी, जिनके पास टिफिन था उन्होंने निकाला. एक लड़की ने अपने पास बैठी मुस्लिम छात्रा शबाना को अपने हाथ से खाना खिलाया और वहां धर्म का कोई भेद नहीं रहा, बस इंसानियत रह गई.वो 15 वर्षीय लड़की दूर से ये दृश्य देखती रही, शायद माँ की याद आई आँखें भर आईं. जब सबने उसे बुलाया, समझाया, तब जाकर वह सहज हुई. उसका नाम था रेखा.
रेखा ने बताया, वह गाँव से अपनी दीदी के पास आई है, 11 भाई-बहनों में सातवें नंबर की है, पढ़ाई छूट गई है अब सौंदर्य प्रसाधन बेचकर माँ-बाप की मदद करती है.
ये सब जानकर लगा कि आज भी देश के कुछ बच्चे शिक्षा से वंचित हैं. आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी ये दृश्य देश की असली तस्वीर दिखाता है.ट्रेन ने हॉर्न दिया, थोड़ी दूरी चली, फिर रुक गई. स्टेशन नज़र आ रहा था लेकिन बरसात विकराल हो चुकी थी. मैंने बाहर झाँका हर तरफ पानी ही पानी.
रेखा की हिम्मत देखकर मैं भी हिम्मत जुटा पाई और पानी में उतर गई. एक कतार में सभी एक-दूसरे का सहारा लेकर आगे बढ़ रहे थे. कुछ नौजवान गड्ढों से बचाकर लोगों की मदद कर रहे थे. और हम अंततः स्टेशन पहुँच ही गए.
भीड़ से भरे स्टेशन पर रेखा एक कोने में चुपचाप बैठ गई. कुछ लोगों ने वहीं रात गुज़ारने का निश्चय कर लिया.
जब मैं स्टेशन से बाहर निकली तो देखा मुंबई के लोग इंसानियत का परिचय दे रहे थे. कोई हाथ पकड़कर निकाल रहा था, कोई सही दिशा बता रहा था, कोई खाने-पानी का इंतज़ाम कर रहा था.
कंधे तक पानी में डूबे रास्तों पर मैं पैदल चली. जब बस आई, तो थकी-हारी उसमें चढ़ गई. वहाँ भी वही बातचीत, वही तकलीफें, वही हौसले थे. अंत में, घर के पास पहुँची पैर बाहर रखा, तो घुटने तक पानी था. लेकिन मन में अब डर नहीं, एक अजीब-सी शांति थी.
मुंबई में इंसानियत अब भी ज़िंदा है. संकट की घड़ी में लोग जात-पात, धर्म, अमीरी-गरीबी सब भूलकर बस एक ही धर्म निभाते हैं

डॉ.शशिकला पटेल, असिस्टेंट प्रोफेसर, मुंबई

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