जरूरी

दामोदर ने कहा, “शहर में तीन दिन से कर्फ्यू था। आज हटते ही दो सौ रुपए की मजदूरी हुई। कल बाबा का श्राद्ध है, कुछ किराना ले आता हूँ।”
पत्नी ने चिंता जताई, “अम्मा की तबियत देख लो, पांच बार उल्टी की और बुखार भी तेज है।”
दामोदर ने पूछा, “फिर क्या करूँ?”
पत्नी ने कहा, “नुक्कड़ वाले डॉक्टर साहब के पास चलो। इलाज जरूरी है।”दामोदर ने मान लिया, “हाँ, सही है। पहले अम्मा का इलाज।”

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…वजूद

कभी-कभी एक साधारण-सी बातचीत हमें किसी भूली-बिसरी सच्चाई से रूबरू करवा देती है। यह कहानी भी ऐसी ही एक स्त्री की है — एक पढ़ी-लिखी बंजारन, जो विवाह के बाद घर-परिवार और खेतों की ज़िम्मेदारियों में इस कदर उलझी कि अपने अस्तित्व का ख्याल रखना ही भूल गई। उसकी सारी सोच अपने बच्चों के भविष्य और परिवार की सेवा में समर्पित रही। हमेशा डरती रही — “मुझे कुछ हो गया तो बच्चों का क्या होगा?” और फिर वही डर सच हो गया।

उसके जाने के बाद, जिस परिवार के लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगाया था, उन्होंने जल्दी ही उसका स्थान भर दिया — दूसरी शादी, आया की व्यवस्था, और जीवन फिर से पटरी पर। और आया भी, जो सबका ख्याल रखते-रखते खुद बीमार होकर चल बसी… उसके बाद भी जीवन नहीं रुका।

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