स्मृति और… तुम!
स्मृति और… तुम!’ प्रेम और अनुपस्थिति के सूक्ष्म भावों को गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती कविता है। स्मृतियों की नमी, इंतज़ार की सीलन और भीगे सन्नाटे के बीच यह रचना बताती है कि प्रेम को अंत तक ढोने के लिए शब्द नहीं, स्मृति चाहिए।

स्मृति और… तुम!’ प्रेम और अनुपस्थिति के सूक्ष्म भावों को गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती कविता है। स्मृतियों की नमी, इंतज़ार की सीलन और भीगे सन्नाटे के बीच यह रचना बताती है कि प्रेम को अंत तक ढोने के लिए शब्द नहीं, स्मृति चाहिए।
यह ग़ज़ल मोहब्बत, जुदाई और दिल की कश्मकश को बेहद खूबसूरती से बयां करती है। हर शेर में बिछड़ने का दर्द, इंतजार और यादों की टीस झलकती है, जो पाठक को भावनाओं की गहराई में डूबने पर मजबूर कर देती है।
यह कविता प्रेम में प्रतीक्षा, विरह और भावनात्मक पीड़ा को बेहद सुंदर तरीके से प्रस्तुत करती है, जो पाठकों के दिल को छू जाती है।