
विजया डालमिया, हैदराबाद
वो हमारा दीवानापन था
या बचपन की मोहब्बत,
जिसे दोस्ती का नाम देकर
करते थे हर पल शरारत।
बड़े होने पर भी
सब कुछ याद है मुझे….
छोटी-छोटी ज़िद, छोटी-छोटी तकरार,
देती थी लंबी-सी खुशी।
वो तपती धूप में
एकटक उसके घर की ओर ताकते रहना,
उसकी एक झलक पाने के लिए।
पैरों में पड़े फफोलों को देखकर
उसका मुझे डाँटना,
और उस डाँट में
अपने प्रति छुपी फिक्र जान
मेरा खुश होकर चहकना।
सहमती आँखों से उसे देखकर
मेरे होठों का लरजना…
आज भी याद है मुझे।
उफ़्फ़! होली की यादें
तो उससे भी ज़्यादा संगीन हैं,
जहाँ उसके साथ
पानी से भी होली खेलने की ललक
कितनी रंगीन है।
उसका खामोशी से
सर झुकाकर गीले होने का अंदाज़,
खुद मुझे ही
गहरे प्यार में भिगो गया।
मेरी किसी भी बात का विरोध न करना,
मुझे उसकी हर बात से
सहमत होना सिखा गया।
वो अनुबंध
जो हम दोनों ने किए ही नहीं,
निगाहों की मासूमियत
कब दिलों पर हस्ताक्षर कर गई,
पता ही नहीं चला।
जीवन के हर पन्ने पर
उसकी स्याही बिखरकर लेखनी बन गई,
और हमारी अनकही प्रीत
धड़कन बन
ज़िंदगी की संगिनी बन गई।
आज भी
सब कुछ याद है मुझे…..
ये रचनाएं भी पढ़ें-
मौन का अपराध
सब कुछ याद है मुझे
तोहमत लगा दीजिए
मां, मुझे भी रोने का हक चाहिए था
इन्तजार

2 thoughts on “सब कुछ याद है मुझे”