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फर्क पड़ता है रिश्तों और किसी के होने की अहमियत पर हिंदी कविता

फर्क पड़ता है

किसी के होने से सचमुच फर्क पड़ता है. उसकी आवाज़, इंतज़ार और छोटी-सी पूछताछ भी जिंदगी में बहुत कुछ बदल देती है. ‘फर्क पड़ता है’ रिश्तों की इसी अनकही सच्चाई को महसूस करती कविता है.

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अपने बचपन के प्रेम और पुरानी यादों में खोई एक युवती, धूप भरे माहौल में पुराने घर की ओर भावुक नज़रों से देखते हुए।

सब कुछ याद है मुझे

विजया डालमिया, हैदराबाद वो हमारा दीवानापन थाया बचपन की मोहब्बत,जिसे दोस्ती का नाम देकरकरते थे हर पल शरारत। बड़े होने पर भीसब कुछ याद है मुझे…. छोटी-छोटी ज़िद, छोटी-छोटी तकरार,देती थी लंबी-सी खुशी।वो तपती धूप मेंएकटक उसके घर की ओर ताकते रहना,उसकी एक झलक पाने के लिए। पैरों में पड़े फफोलों को देखकरउसका मुझे डाँटना,और…

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