फर्क पड़ता है
किसी के होने से सचमुच फर्क पड़ता है. उसकी आवाज़, इंतज़ार और छोटी-सी पूछताछ भी जिंदगी में बहुत कुछ बदल देती है. ‘फर्क पड़ता है’ रिश्तों की इसी अनकही सच्चाई को महसूस करती कविता है.

किसी के होने से सचमुच फर्क पड़ता है. उसकी आवाज़, इंतज़ार और छोटी-सी पूछताछ भी जिंदगी में बहुत कुछ बदल देती है. ‘फर्क पड़ता है’ रिश्तों की इसी अनकही सच्चाई को महसूस करती कविता है.
शायद प्रेम यही तो है जब किसी का होना ही आपकी दुनिया को मुकम्मल कर दे, ख़ामोशियों को गीत और साधारण दिनों को भी ख़ूबसूरत बना दे।
विजया डालमिया, हैदराबाद वो हमारा दीवानापन थाया बचपन की मोहब्बत,जिसे दोस्ती का नाम देकरकरते थे हर पल शरारत। बड़े होने पर भीसब कुछ याद है मुझे…. छोटी-छोटी ज़िद, छोटी-छोटी तकरार,देती थी लंबी-सी खुशी।वो तपती धूप मेंएकटक उसके घर की ओर ताकते रहना,उसकी एक झलक पाने के लिए। पैरों में पड़े फफोलों को देखकरउसका मुझे डाँटना,और…
यह कविता सच्ची दोस्ती की गहराई को दर्शाती है, जहाँ एक दोस्त हर मुश्किल में साथ खड़ा रहता है और बिना कहे दिल की बात समझ लेता है।