
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
फर्क पड़ता है
बहुत फर्क पड़ता है
किसी के होने से…
जैसे खिड़की पर
रखी चाय की प्याली से
कमरे में
थोड़ी-सी सुबह बची रहती है।
बहुत फर्क पड़ता है
किसी के पूछ लेने से
“ठीक हो?”
कभी-कभी
दो शब्द भी
पूरी रात के
साथी बन जाते हैं।
लेकिन कभी-कभी
वक्त के अभाव में
नहीं हो पाती
मुलाकात तो…
चाय ठंडी होती रहती है,
खिड़की खुली रहती है,
और कमरा
पहले जैसा ही होता है,
बस उसमें
किसी की कमी
रहने लगती है।
अजीब बात है…
रिश्ते एकदम से
नहीं जाते।
इसलिए यह कहना कि
कोई फर्क नहीं पड़ता
तुम्हें…
जायज़ नहीं है।
क्योंकि फर्क नहीं पड़ने के पहले
आवाज़ धीमी होती है,
फिर इंतज़ार कम होता है,
फिर शिकायतें भी
चुप हो जाती हैं।
लेकिन न आवाज़ धीमी हुई है,
न इंतज़ार कम हुआ है,
न शिकायतें कम हुई हैं…
और जब
फर्क पड़ना बंद हो जाए न…
समझ लेना,
कहीं भीतर
बहुत कुछ
पहले ही मर चुका है।
इसलिए
फर्क नहीं पड़ने के पहले
फर्क समझ लेना…
जो अपना है,
उससे कह देता हूँ
“तुम्हारे होने से
बहुत फर्क पड़ता है।”
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सही कहा… फ़र्क पड़ता है 😊
Dil ko chhune wale post
अप्रतिम रचना , जो दिल में उतर गई
शानदार
हृदयस्पर्शी कविता.. दिल की कोरों को स्पर्शित
करती हुई
संपादक जी
दूसरे की उपस्थिति की अहमियत समझा देना बहुत कठिन काम है ।
आप नपे – तुले शब्दों से इस लक्ष्य प्राप्ति तक पहुँच गये ,
हार्दिक बधाई ।