लोहड़ी

“लोहड़ी” लघुकथा में प्रेम, मानवता और त्यौहार का सुंदर संगम है। बहु के प्रेम और समझ से सासू माँ का दिल बदलता है, और पर्व स्नेह का प्रतीक बन जाता है।

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टूटे दिल वाली स्त्री खामोशी से अंधेरे कमरे में बैठी हुई, आंखों में दर्द और विश्वासघात का भाव

मेरा संसार

यह कविता एक ऐसे टूटे हुए मन की आवाज़ है, जिसने अपने पूरे संसार को एक ही व्यक्ति में समेट लिया था. भरोसे, प्रेम और समर्पण के बदले उसे झूठ, छल और दर्द मिला. यह रचना विश्वास के टूटने से उपजे आंतरिक संघर्ष, पीड़ा और आत्मबोध को बेहद मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त करती है

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एक भारतीय माँ सुबह के धुंधलके में घर के दरवाज़े पर खड़ी, दूर जाते बेटे को स्नेह और उम्मीद भरी आँखों से देखते हुए.

तुम सपने ज़रूर देखना…

यह कविता सपनों के माध्यम से माँ और संतान के रिश्ते की उस गहराई को छूती है, जहाँ प्रेम स्वार्थ नहीं बल्कि त्याग बन जाता है. महानगर की चकाचौंध के बीच यह रचना याद दिलाती है कि असली ऊर्जा माँ की आँखों में छुपी होती है, और सपनों का सच होना तभी सार्थक है जब उसमें उसकी साँसें बाकी रहें.

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माँ : जो हर अक्स में खुदा

माँ जो बिना कहे हर दुख समेट लेती है और हर सुख में चुपचाप पास खड़ी रहती है। माँ की उपस्थिति यहाँ दूरी से परे, स्मृति और आत्मा में रची-बसी हुई है—ऐसी शक्ति जो कभी जुदा नहीं होती।

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एक दुआ

यह कविता एक माँ के निःस्वार्थ प्रेम और आशीर्वाद की अभिव्यक्ति है, जहाँ वह अपने सुख और उम्र तक को त्याग कर संतान के लिए उज्ज्वल, सुरक्षित और छायादार जीवन की कामना करती है।

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एक पाती मुसाफ़िर के नाम…

जाने से पहले की वह आख़िरी मुलाक़ात जहाँ मौसम, सड़कें, पेड़ और खामोशी तक हमारी बातों के साक्षी बने। मीठी यादों, अनकहे जज़्बातों और एक गलतफ़हमी के बीच खड़ी चुप्पी की दीवार, जो आज भी लौटने से रोकती है।

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अनोखा प्यार

तूफ़ान मेल की छुक-छुक के बीच अचानक अर्जुन की नज़र एक जानी-पहचानी खुशबू पर ठहरी वह निशा थी। छह वर्षों का सन्नाटा पलभर में टूट गया। उम्र की सफेदी बालों में उतर आई थी, पर भावनाओं की गरमी अब भी वही थी। कॉलेज के दिनों का प्रेम, एक गलती से टूटा संबंध, और फिर ट्रेन में यूँ अनायास मिलना.दोनों के भीतर दबा हुआ प्यार फिर से जाग उठा। आधी रात की लंबी बातचीत के बाद अर्जुन ने हाथ बढ़ाया-“मेरे साथ उतरना चाहोगी?” निशा ने बिना झिझक अपना हाथ उसके हाथ में दे दिया। पुराने ग़िले धुल गए थे; दो अकेली ज़िंदगियाँ फिर से एक-दूसरे को पा चुकी थीं।

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स्त्री

प्रेम में डूबी स्त्री कभी नादान-सी लगती है, कभी इतनी कोमल कि जैसे स्पर्श से बिखर जाए। उसके भीतर सपनों की हलचल है. उमड़ती-घुमड़ती, तितर-बितर होती तमन्नाएँ। वह तितली-सी है, जिसे उड़ना तो है, आसमान को छूना भी है, पर उसके चारों ओर फैली दुनिया उसे फूलों के दायरे से बाहर जाने ही नहीं देती। आसमान ऊँचा है, अपने ही गर्व में अडिग; और ज़मीन पर खड़ी वह स्त्री अपने पंख फैलाने को तैयार होते हुए भी उड़ नहीं पाती।

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“मन की देहरी: संवेदनाओं का प्रवेशद्वार”

“‘मन की देहरी’ एक ऐसा काव्य संग्रह है जो पाठक को भीतर तक छू जाता है। पूनम सिंह जी की सरल और भावपूर्ण कविताएँ प्रेम, स्मृति और स्त्री-मन की गहराई को उजागर करती हैं। प्रत्येक पंक्ति जैसे पाठक के अपने अनुभवों का प्रतिबिंब है। एक पुस्तक जो संवेदनाओं और आत्मिक प्रेम का संसार खोलती है।”

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विरह

निशा की नीरवता में बैठी नायिका प्रतीक्षा में लिपटी है .हवा में भीगी चाँदनी, शरीर पर ओस की बूँदें जैसे भावना का स्पर्श कर रही हों। वह प्रिय के आगमन की राह में सजी-संवरी है, मानो सावन स्वयं प्रेम का संदेश लेकर आया हो। मन में उमड़ती आशाओं से मोतियों का हार पिरोती, पलकें प्रतीक्षा की लाली से भीग उठी हैं।

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