अधूरी ख्वाहिश..

गर्मी के एक दोपहर में, सुदीप बनर्जी के अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही है। निधि, जो अपने पति अमितेश के उपेक्षात्मक और हिंसक व्यवहार से वर्षों से जूझ रही है, यह घोषणा करती है कि मुखाग्नि सुदीप का बेटा सुजीत देगा—एक सच्चाई जिसे अब तक कोई नहीं जानता था। विरोध और संदेह के बावजूद, निधि यह साबित करने पर अडिग रहती है कि सुजीत सुदीप का खून है।

सुदीप के गुजरने के बाद, निधि को उसकी एक रिकॉर्डेड ऑडियो क्लिप मिलती है, जिसमें वह अपनी आखिरी ख्वाहिश व्यक्त करता है—कि निधि उसकी मृत्यु के बाद भी उसके नाम का सिंदूर लगाए और उसकी पत्नी की तरह जीवन बिताए। निधि इस इच्छा को उसी रात पूरी करती है।
कुछ दिन बाद, वकील की उपस्थिति में सुदीप की वसीयत पढ़ी जाती है, जिसमें उसकी सारी संपत्ति निधि और उसके बाद सुजीत के नाम की जाती है, और निधि से कहा जाता है कि वह उसकी विधवा नहीं बल्कि सुहागन की तरह इस घर में रहे। यह सब सुनकर सुदीप की माँ निधि को अपनाती है और अपने पोते को गले लगाती है। यह क्षण एक रिश्ते के खोने के दर्द के साथ-साथ नए अपनत्व और स्वीकृति के सुख को भी दर्शाता है।

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नागफनी में फूल

यह कविता नागफनी की रूखी शाख़ पर खिले पहले फूल के दृश्य से आरंभ होती है, जो कवि के भीतर एक गहरी, धीमी लहर की तरह उतरता है। यह दृश्य उसे तुम्हारे श्वेत-श्याम जीवन पर चमकती लाल बिंदी, या बरसों बाद आसमान में उतरे इंद्रधनुष जैसा लगता है। लेकिन कवि सवाल करता है कि तुमने अपने चारों ओर यह कठोर आवरण क्यों बना रखा है, जबकि उसने तुम्हारे भीतर मुस्कान का पहला अंकुर, उसका नन्हा पल और एक सांस लेता हुआ बीज देखा है। वह आग्रह करता है कि इस बीज को बढ़ने, खिलने, फलने का अवसर दो—वरना यह भ्रूणहत्या होगी, चाहे वह भ्रूण नौकरीपेशा ही क्यों न हो, जो काँटों के जंगल में भी फूल की आस रखता है। अंत में, कवि आश्वस्त करता है कि यही बीज नागफनी में भी सुगंध फैला देगा और वह स्वयं, दिल की बाहें फैलाए, उसे समेटने को तैयार है।

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पुश्तैनी घर के बाहर खड़ी संघर्षशील भारतीय महिला, पारिवारिक बंटवारे के बाद भावुक दृश्य।

तिनके

छिन चुकी थीं एक छत, जो बँटवारे की भेंट चढ़ गई थी और मजबूरी में बेचनी पड़ी थी।
वैसे तो सविता को ज़मीन-जायदाद से कोई मोह नहीं था, लेकिन एक रहने को घर तो चाहिए ही था — जो अपना होता। पर जमीनी लालची अपनों ने ही उसका घर छीन लिया था। कानूनी दांव-पेंच में सविता को अपनी पतंग काटने में बरसों लग गए।
जीवन बिखरे तिनकों को समेटने में बीत रहा था। ख्वाहिशों की आग भी अब मध्यम हो चुकी थी।

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कभी मैं याद आऊँ… तो चले आना

कभी-कभी कुछ यादें सिर्फ प्रश्न नहीं होतीं, वे उत्तर भी नहीं होतीं—वे प्रार्थनाओं जैसी होती हैं, जो किसी के दिल की दहलीज़ पर दीप की तरह जलती रहती हैं। यह कविता नहीं, बल्कि प्रेम की उस शांत पुकार का दस्तावेज़ है जो बिना किसी आरोप या उत्तरदायित्व के, बस यादों की नम परतों में छुपा होता है। जब भी मन थक जाए, कोई मुस्कान याद आ जाए, या बारिश में घुलने की इच्छा हो, तब लौट आने की स्वीकृति देने वाली यह पुकार, प्रेम की सबसे कोमल और निस्वार्थ अभिव्यक्ति है। प्रेम, जहाँ आना जाना नहीं, बस “होना” ही काफ़ी होता है।

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प्रयागराज-सा संगम मन

कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जो कही नहीं जातीं, लेकिन दिल की गहराइयों में अनवरत बहती रहती हैं — सिसकती हुई, दबी हुई, फिर भी महसूस होती हुई। ये धड़कनों में छिपे वो एहसास हैं जो न पूरी तरह अव्यक्त हैं, न पूरी तरह अभिव्यक्त। दिल मानो एक ऐसा प्रयाग है जहाँ हर भावना, हर याद, हर संबंध एकत्र हो जाता है — जैसे गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम।हाल ही में जन्मे एक मासूम से इश्क़ ने मन को कुंभ की तरह भीगो दिया है — वह भी मौन में, तप में, जल में और हवा के हर स्पर्श में। तेरी उपस्थिति जैसे हर तत्व में घुल गई है। इस भावनात्मक संगम में अब प्रेम और भक्ति एकसाथ बह रहे हैं। मन जैसे प्रयागराज बनकर इंद्रियों में शंखनाद कर रहा है — बुला रहा है, कि अब इस प्रवाह में तुम भी आ जाओ।

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धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

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बरसाती आकाश के नीचे दूर क्षितिज की ओर देखते दो धुंधले मानवीय सिल्हूट, प्रेम, दूरी और अस्तित्व की खोज का प्रतीकात्मक दृश्य।

प्रेम

प्रेम क्या है? शायद कोई निश्चित उत्तर नहीं। यह कविता प्रेम को सामाजिक सीमाओं, वर्ग, धर्म और परिभाषाओं से परे एक ऐसी अनुभूति मानती है, जो पूरी नहीं होती—सिर्फ खोजी जाती है।

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ज़िंदगी कुछ इस तरह…

वो शाम, वो शहर, वो गुलाब, वो चाय — सब कुछ जो मेरा था, किसी और का हो गया। मेरी हर पसंद, हर भावना, हर छुअन की कल्पना… कोई चुपचाप अपने साथ ले गया। यह कविता नहीं, मेरी बिखरी हुई ज़िंदगी की दास्तान है।

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जब स्त्री प्रेम करती है….

वो सीता की तरह अग्नि परीक्षा देती है, उर्मिला की तरह प्रतीक्षा करती है, राधा की तरह वियोग को स्वीकारती है, और मीरा की तरह प्रेम में ज़हर भी अमृत मान लेती है। स्त्री का प्रेम त्याग है, मौन की पुकार है, और एक सम्पूर्ण सृष्टि है — जिसे समझने के लिए साधक बनना पड़ता है।

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प्रेम…हुई शाम उनका ख़्याल आ गया… 🎵🎶

रात की निस्तब्धता में प्रेम का प्रश्न भीतर गूंज रहा था। संगीत की सधी स्वर लहरियाँ मन को ऐसे छू गईं कि सब तर्क-वितर्क, प्रश्न-उत्तर उस तकिए पर ढुलकी एक बूंद में विलीन हो गए… जैसे प्रेम समझाने का नहीं, केवल महसूस करने का विषय हो।

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