फूल

काँटों के बीच खिला हुआ लाल गुलाब, दर्द और खूबसूरती का प्रतीक

डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई

वह सिर्फ़ फूल नहीं था,
वह एक हिम्मत था
काँटों के बीच
ख़ुद को कोमल रखने की।

हर पंखुड़ी में
छुपी थी कोई अनकही बात,
जैसे मुस्कुराहट ओढ़े
आँखों में ठहरी नम बात।

लोग उसकी खुशबू पर रीझे,
पर किसी ने यह नहीं पूछा
कितनी चोटों से गुज़रकर
उसने यह रंग पाया।

गुलाब ने सिखाया मुझे
कि खूबसूरती
नाज़ुक होने में नहीं,
दर्द सहकर भी
महकते रहने में है।

जब मुरझाया, तो भी शिकायत नहीं की,
चुपचाप ज़मीन को सौंप दिया
अपना आख़िरी रंग
जैसे प्रेम
कभी ख़त्म नहीं होता,
बस रूप बदल लेता है।
लेखिका के बारे में-

डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।

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