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मनचाहे रंग…

कृष्णा तिवारी कृति, बिरलाग्राम, नागदा जं. (मध्यप्रदेश)

चित्रकार थी वो,
परंतु…
नहीं भरती
अपनी आत्मा में
अपने चित्त के अनुरूप,
या अशुद्ध रंग।
जमाना उसे
“बेचारी” कहा करता था।

तब वह सारथी थी, कृष्ण सी
उस रथ पर…।

अब दौड़ाती है
बे लगाम घोड़े,
मांगती है वरदान,
कैकई की भांति
उपकार के बदले।

अब आसमान नीला नहीं,
धरती बंजर, पानी सूखा।
भरती है मनचाहे रंग
अपनी आत्मा में,
अपने चित्त के अनुरूप,
या गणितीय संक्रियाओं
के आधार पर।

आज वह बेचारी नहीं,
वैचारगी है।

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