गहना

यदि तुम्हें गहना पहनना है तो बेशक पहनो, लेकिन उस नगीने को मत खोना, जिसकी पहचान समय ने तुम्हें बड़ी मुश्किल से कराई है। अब कुदालों की बाट देखना बंद करो और अपनी सुइयाँ उठाओ—वे सुइयाँ जिन्हें जन्म लेते ही तुम्हारे हाथों में थमाया गया था। जब प्यास बढ़े, तो इधर-उधर ताकना मत, बल्कि अपनी तुरपाई वाली सुइयाँ पैनी करो। उसी से निर्मल जल का स्रोत मिलेगा, कुआँ खुदो और अपनी प्यास बुझाओ। इतना करने के बाद भी जीत का जश्न मनाना मना है। जीत की सांसों में हार को भी पहचानो, जो तुम्हें सबसे भावुक पलों में पटखनी देती आई है। इस बीच, ओढ़ लो अपना आत्मविश्वास और अपने सबसे थके हुए दिन को अमर बना दो। जीवन का अभियान सालों में नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन में छिपा है। यही सोचकर जीवन की धूप मांग लो और उसे अपने लिए माँगटीका बना दो। सबसे जरूरी है कि तुम अपने लिए हमेशा सुहागिन बने रहो।

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मनचाहे रंग…

वह चित्रकार थी, लेकिन कभी अपने चित्त और आत्मा के अनुरूप पूरी तरह नहीं रंग भर पाई। समाज उसे “बेचारी” कहता था। तब वह कृष्ण के सारथी की तरह अपने रथ को चलाती थी। अब वह स्वतंत्र है—बे लगाम घोड़े दौड़ाती है, वरदान मांगती है, और उपकार के बदले कुछ चाहती नहीं। आसमान नीला नहीं, धरती बंजर और पानी सूखा है, फिर भी वह अपने मनचाहे रंग अपनी आत्मा में भरती है, चाहे वह गणितीय नियमों के आधार पर हों। आज वह अब बेचारी नहीं, बल्कि वैचारगी और सशक्तता का प्रतीक है।

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जन्‍म नहीं दोगी मुझको?

एक अजन्मी बच्ची अपनी माँ से प्रश्न करती है—“माँ, मैं भी तो तुम्हारा ही अंश हूँ, फिर क्यों मुझे जन्म नहीं दोगी? मेरा कसूर क्या है?” वह कहती है कि उसने अब तक न तो सूरज की रोशनी देखी है, न फूलों का खिलना, न चिड़ियों की चहक सुनी है। धरती पर कदम रखने से पहले ही उसे बोझ मान लिया गया है।

वह माँ से निवेदन करती है कि उसे एक बार दुनिया में आने का अवसर मिले। वह भरोसा दिलाती है कि कभी माँ पर बोझ नहीं बनेगी, बल्कि नाम रोशन करेगी। वह सानिया मिर्ज़ा, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला, साइना नेहवाल और प्रतिभा पाटिल जैसी महान महिलाओं का उदाहरण देती है और कहती है कि वह भी वैसा ही बनकर दिखा सकती है।

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