दोस्त को सलाम
“दोस्त को सलाम” बचपन से शुरू हुई 35 वर्ष पुरानी दोस्ती की भावनात्मक यात्रा है। स्कूल की शरारतों, बिछड़ने, वर्षों बाद फिर मिलने और रिश्तों की अटूट गरमाहट को सहेजता यह संस्मरण बताता है कि सच्ची दोस्ती समय और दूरी से कभी कम नहीं होती।

“दोस्त को सलाम” बचपन से शुरू हुई 35 वर्ष पुरानी दोस्ती की भावनात्मक यात्रा है। स्कूल की शरारतों, बिछड़ने, वर्षों बाद फिर मिलने और रिश्तों की अटूट गरमाहट को सहेजता यह संस्मरण बताता है कि सच्ची दोस्ती समय और दूरी से कभी कम नहीं होती।
नीम के पेड़ से झाँकता हुआ चाँद सिर्फ़ आसमान का चाँद नहीं, बल्कि समय का मौन साक्षी है। जून की तपती रात में चारपाई पर लेटी एक स्त्री अपनी स्मृतियों, रिश्तों और बदलती पीढ़ियों की यात्रा को चाँद से साझा करती है। यह रचना जीवन के बदलते पड़ावों की मार्मिक अनुभूति कराती है।
सावन के एक सांस्कृतिक समारोह में हुई एक साधारण-सी मुलाकात समय के साथ जीवनभर की सच्ची दोस्ती में बदल गई। यह संस्मरण विश्वास, अपनत्व, निस्वार्थ साथ और आत्मीय रिश्तों की सुंदर कहानी कहता है। इसमें बताया गया है कि कैसे ईश्वर की कृपा से मिलने वाले कुछ लोग जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं और हर सुख-दुख में बिना कहे साथ निभाते हैं।
कुछ रिश्ते भले ही जीवन से चले जाएँ, लेकिन उनकी यादें हमेशा साथ रहती हैं। यह कविता बिछड़ने के बाद भी दिल में बसे प्रेम, अधूरी मुलाकातों, बारिश की स्मृतियों और अनकहे एहसासों को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है।
कलियुग में अच्छाई और बुराई के संघर्ष को प्रस्तुत करती यह विचारोत्तेजक कविता आत्मचिंतन, मानवीय मूल्यों और समाज की बदलती सोच पर गहरा संदेश देती है। कविता बताती है कि सच्ची जीत अच्छाई और सत्य के मार्ग पर चलने में ही है।
पति के विश्वासघात के बाद जब रीना का संसार उजड़ जाता है, तब उसकी सास शांता उसे अकेला नहीं छोड़ती। वह बहू को बेटी का दर्जा देकर अपनी पूरी संपत्ति उसके नाम करने का निर्णय लेती है। यह लघुकथा बताती है कि खून से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और अपनत्व से रिश्ते बनते हैं।
नई दिल्ली से लेकर पुणे तक छात्र आंदोलनों में दिखाई दे रही जेनजी की भाषा कई सवाल खड़े करती है। क्या गालियों वाले पोस्टर केवल असभ्यता हैं या वर्षों से जमा आक्रोश की अभिव्यक्ति? यह लेख जेनजी के स्वभाव, सोशल मीडिया, वेब सीरीज़ और बदलती विरोध संस्कृति का संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
कुछ एहसास ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में बाँधना आसान नहीं होता। “अल्फाज़ नहीं मिलते” ग़ज़ल में प्रेम, खामोशी, विरह, आत्मिक पीड़ा और अनकही भावनाओं का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है। हर शेर दिल की गहराइयों में उतरकर पाठक को अपने अनुभवों से जोड़ देता है।
क्या संस्कार का अर्थ केवल आज्ञाकारिता है, या सच कहने का साहस भी? यह लेख उस पीढ़ी की कहानी है जिसने स्वयं चुप रहकर जीवन जिया, लेकिन अपने बच्चों को प्रश्न पूछना, तर्क करना और सम्मान के साथ अपनी बात कहना सिखाया।
आधुनिक बिजली के पंखों और एसी के दौर में भी कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो मन को बरबस अतीत में ले जाती हैं। यह कविता “साटन का मोरा बीजना” पुराने समय के डोरी से चलने वाले झालरदार बीजने, घर-आँगन की आत्मीयता, संयुक्त परिवार की मधुरता और बचपन की सुकून भरी दोपहरों का मार्मिक चित्रण करती है।