
अमिता श्रीवास्तव , लखनऊ
सुबह से ही घर में गहमा-गहमी थी। हिमाचल से लड़की वाले बात पक्की करने के लिए जो आ रहे थे। बात तो खैर पहले से ही पक्की थी, क्योंकि बच्चे साथ ही पढ़े थे और फोन पर बातचीत करके दोनों परिवारों की आपसी सहमति भी बन चुकी थी। अब तो बस आगे की औपचारिकताएँ पूरी करनी थीं।
मैंने भी उनके स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी। अपने यू.पी. के विशेष पकवानों से पूरी रसोई महक उठी थी।
वे लोग नियत समय पर आए। साथ में हमारे लिए हिमाचल के कुछ प्रसिद्ध तोहफे भी लाए। कुल्लू शॉल, हिमाचली टोपी इत्यादि के साथ जो सबसे खास था, वह था .एक बड़े से पीतल के थाल पर विष्णु जी के बारह स्वरूप।
“शगुन के मौके पर दिया जाने वाला यह थाल हमारे यहाँ का सबसे खास तोहफा होता है,” माँ ने चहकते हुए बताया।
“और हाँ, हिमाचल की सेपूबड़ी भी बहुत प्रसिद्ध है, पर मैं नहीं लाई, क्योंकि हमारे यहाँ शगुन के मौके पर सेपूबड़ी नहीं दी जाती,” उन्होंने आगे जोड़ा।
मुलाकात काफ़ी अच्छी रही। आगे के सभी कार्यक्रम तय हुए।
इसके बाद बच्चों में आपस में जाने क्या हुआ, रिश्ता टूट गया। हम दोनों परिवारों के लिए यह एक गहरा धक्का था।
इस घटना के कुछ दिनों बाद मैं अपने शहर में लगी एक प्रदर्शनी देखने गई। प्रत्येक प्रदेश की प्रसिद्ध चीज़ों से प्रदर्शनी सजी हुई थी। हिमाचल प्रदेश की स्टॉल के सामने आते ही मेरी निगाह अचानक सेपूबड़ी पर ठहर गई।
“अच्छा हुआ, जो उस दिन यह साथ नहीं आई थी, नहीं तो सारा दोष इस बेचारी के मत्थे ही जाता,” मैं मन ही मन बड़बड़ा रही थी।
