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…कि मुझे सब याद है

बारिश में खिड़की के पास खड़ी एक युवती, हाथ में सूखा गुलाब लिए दूर क्षितिज की ओर देखती हुई। उसके चेहरे पर बिछड़ने की पीड़ा और पुरानी यादों की गहरी भावनाएँ झलक रही हैं।

गुरप्रीत कौर

मैं नहीं जाना चाहती वहाँ,
जहाँ तुम मुझे पहली बार मिले थे।

मैं उस एहसास को महसूस नहीं करना चाहती,
जब तुमने मुझे पहली बार छुआ था।

नहीं याद करना चाहती उन बारिशों को,
जब तुम मुझसे मिलने आया करते थे
और मैं तुम्हारा इंतज़ार करती थी।

नहीं याद करना चाहती तुम्हारा मेरी परवाह करना,
मेरे आँसू गिरने से पहले
मुझे अपनी बाहों में समेट लेना,
फिर कहना- “मैं तुम्हारे लिए हमेशा हूँ।”

नहीं याद करना चाहती
तुम्हारे साथ की हुई यात्राएँ
हाथों में हाथ थामे देखे हुए पहाड़, झीलें, झरने,
और तुम्हारे द्वारा दिए गए गुलाब।

नहीं रखना चाहती मैं तुम्हें अपने ख़यालों में भी,
नहीं बताना चाहती तुम्हें
कि मुझे सब याद है।

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