
पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर
कहते हैं कि कुछ रिश्ते बनाए नहीं जाते, वे ईश्वर की इच्छा से जीवन में उतर आते हैं। कुछ लोग हमारे जीवन में यूँ ही नहीं आते, वे हमारे अधूरेपन को पूरा करने के लिए भेजे जाते हैं। मेरी सखी नीलम पेड़ीवाल भी मेरे जीवन में कुछ ऐसे ही आईं।
सावन का महीना था। चारों ओर हरियाली, रिमझिम फुहारें और मन में उत्साह का मौसम था। तुलसी भवन में सावन समारोह का आयोजन हुआ था। रंग-बिरंगे परिधानों, गीतों और हँसी-ठिठोली के बीच मेरी मुलाकात नीलम पेड़ीवाल से हुई। पहली बार हमने एक-दूसरे से बातें कीं और फिर सावन के गीतों पर साथ नृत्य भी किया। उस समय यह कहाँ पता था कि यह छोटी-सी मुलाकात जीवन की सबसे खूबसूरत दोस्ती की नींव बन जाएगी।

समारोह समाप्त हो गया, लेकिन हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया। फिर एक-दो बार और मुलाकात हुई। हर मुलाकात के साथ हम एक-दूसरे को थोड़ा और समझने लगे। धीरे-धीरे औपचारिक परिचय आत्मीयता में बदल गया और आत्मीयता ऐसी गहरी मित्रता में, जिसकी डोर आज भी उतनी ही मजबूत है। अब तो स्थिति यह है कि यदि एक-दूसरे से बात न हो, तो दिन जैसे अधूरा-सा लगता है।
कई बार मन कहता है कि यह केवल संयोग नहीं हो सकता। अवश्य ही भोलेनाथ की कोई विशेष कृपा रही होगी कि मुझे नीलम जैसी सखी मिली। वह केवल अच्छी ही नहीं हैं, बल्कि बेहद सरल, निष्कपट, संवेदनशील और मन से बहुत सुंदर इंसान हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे स्वभाव में एक अद्भुत समानता है। शायद यही कारण है कि बिना कुछ कहे भी हम एक-दूसरे की भावनाएँ समझ लेते हैं।

मुझे आज तक याद नहीं कि मैंने उनसे किसी काम के लिए कहा हो और उन्होंने कभी “ना” कहा हो। उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है। न कोई झुंझलाहट, न कोई शिकन। वे हर काम इतने प्रेम, सहजता और अपनत्व से करती हैं कि मन बार-बार यही सोचता है. शायद पिछले जन्म में मैंने सचमुच कोई पुण्य किया होगा, तभी इस जन्म में मुझे ऐसी सखी मिली।
नीलम अपने परिवार की भी धुरी हैं। अपनी सासू माँ, दो बच्चों और जीवनसाथी के साथ वे पूरे समर्पण से परिवार का हर दायित्व निभाती हैं। साथ ही वे एक कुशल और समर्पित शिक्षिका भी हैं। विद्यालय के बच्चे उन्हें केवल अध्यापिका नहीं, बल्कि अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। अपने कार्य के प्रति उनकी ईमानदारी, अनुशासन और समर्पण उन्हें सबसे अलग पहचान देते हैं। वे हर जिम्मेदारी को पूरे मन और पूरे सौ प्रतिशत समर्पण के साथ निभाती हैं।

इतनी सारी जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने हमारी मित्रता के लिए हमेशा समय निकाला। यही तो सच्चे रिश्तों की पहचान होती है—समय मिलने पर साथ देना नहीं, बल्कि समय निकालकर साथ निभाना।
आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि सावन का वह दिन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि मेरी ज़िंदगी का एक अनमोल मोड़ था। उस दिन मुझे केवल एक परिचित नहीं मिली थीं, बल्कि एक ऐसी सखी मिली थीं, जो मेरी खुशियों में सबसे पहले मुस्कुराती हैं और मेरे दुखों में बिना कहे मेरा हाथ थाम लेती हैं।
दोस्ती का रिश्ता खून का रिश्ता नहीं होता, लेकिन कई बार वह हर रिश्ते से अधिक गहरा और सच्चा बन जाता है। नीलम मेरे लिए केवल एक सहेली नहीं, बल्कि मेरी हमराज़, मेरी शुभचिंतक और मेरी आत्मीय बहन जैसी हैं।
भोलेनाथ से मेरी बस यही प्रार्थना है कि हमारी यह दोस्ती जीवनभर यूँ ही बनी रहे। हर सावन हमें उस पहली मुलाकात की याद दिलाता रहे और हमारी मित्रता का यह रिश्ता समय के साथ और भी अधिक स्नेह, विश्वास और आत्मीयता से महकता रहे।
