भला जो देखन मैं चला…

अच्छाई और बुराई के प्रतीकात्मक रूप में प्रकाश और अंधकार के बीच खड़ा एक चिंतनशील व्यक्ति, जो आत्मचिंतन और मानवीय मूल्यों का संदेश देता है।

राकेश चंद्रा

भला जो देखन मैं चला, मुझसे भला न कोय।
सबके चेहरे ढँके हुए, सच रहा है सोय।।

यूँ तो इस संसार में है, बुरे लोगों की भीड़।
भले लोगों ने फिर भी, बना लिये कुछ नीड़।।

बड़े से इस संसार में, रहते लोग अनेक।
कुछ बुरे बनकर भले, रहे रोटियाँ सेंक।।

बुराई की हर फसल के, बीज सदा उपलब्ध।
बोये, काटे स्वयं ही, कहने को प्रारब्ध।।

बुराई के इस युग में, जो बदल सके अंदाज।
वही है असली सूरमा, नवयुग के तीरंदाज।।

कलियुग में बन गई, बुराई एक हथियार।
भला आदमी चढ़ रहा, बलिवेदी पर बारंबार।।

बुराई बनने की लालसा, पकड़ रही है जोर।
अच्छाई को मिले, बमुश्किल कोई ठौर।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *