सूर्योदय के समय खड़ा एक व्यक्ति, जिसके पीछे राम का प्रतीकात्मक प्रकाश आभामंडल, आंतरिक जागृति और आध्यात्मिक ऊर्जा को दर्शाता हुआ दृश्य

“जाग जाओ तो राम हो”

यह कविता व्यक्ति के भीतर छिपे रामत्व को जागृत करने की प्रेरणा देती है। कवि ने राम, रावण, कुंभकर्ण, जटायु और गिलहरी जैसे प्रतीकों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि हर इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं। यदि हम अपने विवेक और संस्कारों को जगाएं, तो हम भी अपने जीवन में राम के आदर्शों को प्राप्त कर सकते हैं।

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सूर्योदय का शांत और ऊर्जा से भरा प्राकृतिक दृश्य

सूर्य वंदना

यह कविता प्रातःकालीन सूर्य की किरणों के माध्यम से प्रकृति के नवजीवन, ऊर्जा और जागृति का अत्यंत सुंदर चित्रण करती है। कवि ने मरीचि (सूर्य किरण) को समर्पित भावों के जरिए यह दर्शाया है कि किस प्रकार हर सुबह नई आशा, नई चेतना और सकारात्मकता लेकर आती है।

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खिड़की के पास बैठा व्यक्ति डायरी में कविता लिखते हुए, आसपास शांत वातावरण और रचनात्मक माहौल

शब्दों का जादू

यह कविता शब्दों और भावनाओं की उस दुनिया को दर्शाती है, जहाँ कविता हँसी, आँसू, सच और सपनों का सुंदर संगम बन जाती है। यह रचना बताती है कि कविता सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। हर पंक्ति में छुपा एहसास जीवन को रंगीन बना देता है।

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निर्बल व्यक्ति को सहारा देता हुआ इंसान, मानवता और करुणा का प्रतीक दृश्य

निर्बल की तुम ढाल बनना

निर्बल की तुम ढाल बनना एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो मानवता, करुणा और सहानुभूति का संदेश देती है। यह रचना हमें सिखाती है कि जो कमजोर हैं, उन्हें सहारा देना और उनके आँसू पोंछना ही सच्ची इंसानियत है।

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प्रभु दर्शन की चाह में तड़पती आत्मा आकांक्षा कविता

आकांक्षा

“आकांक्षा” एक संवेदनशील भक्ति कविता है, जिसमें एक भक्त की प्रभु के साक्षात दर्शन पाने की गहरी तड़प और आत्मिक संवाद को बेहद मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया गया है.

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साध्वी श्री शाश्वतप्रिया जी म.सा. का महिदपुर रोड में भव्य मंगल प्रवेश

साध्वी शाश्वतप्रिया म.सा. आदि ठाणा का भव्य मंगल प्रवेश

महिदपुर रोड में साध्वी श्री शाश्वतप्रिया जी म.सा. आदि ठाणा का भव्य मंगल प्रवेश। गुरुदेव जयघोष, धर्मसभा और रतलाम चातुर्मास निमंत्रण।

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रात के समय खिड़की के पास बैठा एक लेखक, कोरे काग़ज़ पर कलम से भावनाएँ लिखता हुआ

एहसासों का लावा…

लेखक केवल शब्द नहीं लिखता, वह अपने भीतर उमड़ते भावों को स्याही में घोलकर काग़ज़ पर उतारता है। कलम उसकी भावनाओं का वाहक बनती है और कोरा काग़ज़ अहसासों का सजीव संसार। यही लेखन श्रोताओं के दिल तक पहुँचकर अपनी अमिट छाप छोड़ देता है।

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महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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माँ : जो हर अक्स में खुदा

माँ जो बिना कहे हर दुख समेट लेती है और हर सुख में चुपचाप पास खड़ी रहती है। माँ की उपस्थिति यहाँ दूरी से परे, स्मृति और आत्मा में रची-बसी हुई है—ऐसी शक्ति जो कभी जुदा नहीं होती।

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