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बूँदों की पदचाप…

मैं ध्यानमग्न होकर आज वर्षा की बूँदों की पदचाप सुन रही हूँ। ये बूँदें जैसे कोई देववधू बनकर घूँघट काढ़े आई हों और धरती से मधुर आलिंगन कर उसका संताप हर रही हों। मिट्टी में मिलकर अंकुरित होने लगीं, मानो जीवन की नई कोंपलें फूटने लगी हों। पूरी प्रकृति जैसे किसी रचनात्मक क्रीड़ा में सम्मिलित हो गई हो। इन बूँदों ने तन-मन को धोकर शुद्ध कर दिया, और भीतर की Maya को खोज निकाला। प्रत्येक बूँद अब एक मोती बन गई है, जिसे मन सहेज रहा है, मानो किसी गूढ़ तत्व से मिलने का जाप हो रहा हो।

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रेत से ख़्वाब आँखों में आफ़ताब

ज़िंदगी हर रोज़ रेत-सी थोड़ी-थोड़ी फिसलती जाती है, और आँखों में ख्वाब आफ़ताब की तरह जलते हैं। कामयाबियों की चर्चा तो सब करते हैं, मगर नाकामियों से जब सामना हुआ था, उसका भी कभी हिसाब देना पड़ेगा। समाज की यही रीत है कि वह चैन से जीने नहीं देता और अनचाहे सवालों के जवाब मांगता है। दूसरों की गलतियों पर उंगली उठाने वालों को पहले अपनी करतूतों की किताब खोलकर देखनी चाहिए। फकीर फकीर ही रहा, क्योंकि उसने चापलूसी नहीं की – वहीं नवाब बनते गए जो मीठी बातों में उलझे रहे। लेकिन जिसने सच कहा, वो हमेशा गलत समझा गया। फिर भी, अपने विश्वास की चाल न टूटी है, न टूटेगी।

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शब्द मेरे भाव मेरे

निरुपमा सिंह, बिजनौर उमड़ते भावों कोशब्दों में उकेरनान जाने यह शौक !कब और कैसे पनप गयानन्हा पौधा था जोअब वृक्ष बन गयाकुछ तो बचपन से ही थाप्रकृति का सान्निध्य मिलास्वयं ही हरा-भरा हो गयापानी के स्पर्श मात्र से हीखूब फल-फूल गयाउर्वरा के सान्निध्य मेंदोगुना हो गयामानों इच्छाओं कोखुला आकाश मिल गया। Post Views: 396

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यदि प्रेम में होते बुद्ध…

अगर बुद्ध प्रेम में होते, तो शायद वे किसी वृक्ष की छाया के बजाय किसी प्रिय की मुस्कान को ध्यानस्थ होने का स्थान चुनते। उनके उत्तर तब भी मौन होते, लेकिन उस मौन में प्रेम की एक गहरी समझ समाई होती। वे प्रेमिका की आँखों में जीवन का अर्थ खोजते, जैसे निर्वाण की झलक किसी मानस में देख रहे हों। वे प्रेम को उसी तरह थामते जैसे उन्होंने उस कटोरे को थामा था जिसमें संसार का सारा दुःख समाया था—बिना अपेक्षा, बिना आहट। उनका प्रेम निःस्वार्थ और निर्लिप्त होता, जैसे संन्यास लिया हो—पूरी तरह समर्पित, फिर भी पूर्ण स्वतंत्र। न उसमें मोह होता, न विरक्ति—सिर्फ सहज स्वीकृति। प्रेम, उनके लिए, कोई उन्माद नहीं बल्कि एक शांत, स्थिर जलधारा होता, जो “मैं” और “तू” के पार ले जाती। तब शायद हम भी समझ पाते कि प्रेम भी एक मार्ग है—मोक्ष की ओर, जहाँ खोना ही पाना है, और समर्पण ही सबसे बड़ा बोध।

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इंद्रधनुष

एक उजली किरण के छू जाने से मन का चमन संदल-सा हो गया। ज़िंदगी फिर एक बार ख़ूबसूरत लगी, जैसे खुला आसमान ख़्वाहिशों को नई उड़ान दे गया हो। प्रेम की तरंगें, अधरों की मुस्कान, स्वप्न-सज्जित नयन, और मन की मंज़िल को पाई लगन — हर पंक्ति प्रेम, सौंदर्य और आत्मिक उल्लास से भीगी हुई है।

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हरीतिमा

हरीतिमा कविता में कवयित्री ने प्रकृति की सौंदर्यता और उसकी अद्भुत पुनरुत्थान शक्ति को दर्शाया है। अंधड़ में धराशायी हुए वृक्षों के अवशेषों पर फिर से नवपल्लव खिलते हैं, जीवन की जिजीविषा से भरा एक बैंजनी फूलों का कतार उग आता है। कविता यह संदेश देती है कि धरती बिना किसी लेन-देन के अपार स्नेह और जीवन देती है। हरीतिमा का यह निस्वार्थ उपहार कवयित्री के अंतर्मन में कवि के उस अमर वाक्य को बार-बार गूंजने पर विवश करता है – “आ: धरती कितना देती है!”

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मुंबई में आयोजित हुआ ‘केवल काव्य परिवार’ का भव्य काव्य संध्या समारोह

चेन्नई से पधारे कवि-उद्योगपति केवल कोठारी के सम्मान में हुआ आयोजन नवी मुंबई, 14 जून साहित्यिक प्रेमियों के लिए शनिवार की शाम खास रही, जब सेक्टर-21, खारघर में आयोजित हुई एक भावपूर्ण और भव्य काव्य संध्या। यह आयोजन “केवल काव्य परिवार” के संस्थापक, चेन्नई से पधारे उद्योगपति व कवि श्री केवल कोठारी के मुंबई आगमन…

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डिब्बे वाले

“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।

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खिड़की के पास बैठा एक अकेला व्यक्ति, हाथ में ख़त लिए, जो इंतज़ार और अधूरे इश्क़ को दर्शाता है

ख़ामोशी के पते

कुछ पतों के पते कभी मिलते नहीं, और कुछ खतों के जवाब लौटकर नहीं आते। ये कविता अधूरी मोहब्बत, अनकहे जज़्बात और खामोश इंतज़ार की एक सजीव तस्वीर पेश करती है—जहाँ भावनाएं शब्दों से कहीं ज़्यादा कह जाती हैं।

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कंक्रीट को तोड़कर उगता पीपल का पेड़ और आत्मविश्वास से खड़ी एक मजबूत महिला

जहाँ कुचली जाती है, वहीं उगती है स्त्री

“जिन्हें तोड़ा जाता है, वे पीपल के समान फिर उगते हैं पूरी शिद्दत के साथ।
जहाँ उम्मीदें नहीं होतीं, वहाँ भी हरे-भरे बने रहते हैं।स्त्रियाँ भी ऐसी ही होती हैं जहाँ कुचली जाती हैं,
वहीं अत्यंत सहनशीलता के साथ दोबारा उगती हैं।

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