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मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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खंडहर महल

कभी ये महल रोशनी और रौनक से भरे रहते थे। उनकी दीवारों पर तस्वीरें मुस्कुराती थीं और झरोखों से सपनों की हवाएँ बहती थीं। लेकिन आज वही महल खामोश और वीरान खड़े हैं। उनकी दरारों में घास उग आई है और सन्नाटा इतना गहरा है कि बस हवा की गूंज सुनाई देती है, जैसे वक्त सब कुछ चुपचाप चुरा ले गया हो। जहाँ कभी कदमों की आहट और राग–रंग की महफ़िलें सजती थीं, वहाँ अब धूल और पत्थरों की चादर बिछी है। ये खंडहर सिर्फ टूटे पत्थर नहीं, बल्कि समय के साक्षी हैं, जो बताते हैं कि वैभव मिट जाता है, पर इतिहास हमेशा जीवित रहता है।

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मैं कब से थी नीर की बदरी

कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।

फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।

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प्रेरणा की स्वामिनी

यह कविता वेदना को संबोधित करते हुए लिखी गई है। कवि पूछता है कि क्यों हृदय थका हुआ और मन उद्विग्न है, क्यों विरह की बदली आँसुओं से भरी रहती है और क्यों उसे आकाश का कोई कोना भी नसीब नहीं होता।

वह वेदना को प्रेरणा की देवी मानकर कहता है कि सभी लोग तुम्हें आधुनिक मीरा कहते हैं—क्या तुम्हें भी विषपान करना पड़ा? कवि चाहता है कि जैसे गणपति प्रथम पूज्य हैं, वैसे ही वह वेदना को पूज्य मानकर आराधना करे, क्योंकि काव्य-जगत में वही उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा है।

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इंतज़ार करता आँगन

चार बेटे होने के बावजूद, उस बुज़ुर्ग दंपत्ति को जीवन के अंतिम पड़ाव पर अकेलापन ही नसीब हुआ। सबने अपना-अपना जीवन चुन लिया, लेकिन अपने पीछे छोड़ गए वे माँ-बाप, जिनकी आँखें अब भी दरवाज़े की ओर टिकी रहती हैं। दादा-दादी अब पोतों की कहानियों और संस्कारों की बातें नहीं कर सकते, क्योंकि वे अब आसपास ही नहीं हैं।

घर की चिंता, इज़्ज़त और नाम की रक्षा अब किसे करनी है — ये सवाल दीवारों से टकराकर लौट आते हैं। माँ-बाप अब खुद को विरह की आग में झोंकने को तैयार हैं, क्योंकि बेटा अब बड़ा हो चुका है, पढ़-लिखकर देश से दूर जा चुका है, अपनी ज़िंदगी बनाने।

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“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

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प्रेरणादायक कहानियां | अनसुने हीरो |

अनसुने हीरो को पहचान दिलाने की पहल

हम डिजिटल मीडिया की ताकत का उपयोग करते हुए प्रेरणादायक व्यक्तियों, संस्थाओं और विचारों की कहानियों को दुनिया तक पहुंचाते हैं. हमारा उद्देश्य केवल कहानियां साझा करना नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की एक नई लहर शुरू करना है.

हम विशेष रूप से उन अनसुने हीरो को सामने लाना चाहते हैं, जो बिना किसी पहचान या प्रचार के जमीनी स्तर पर लगातार काम कर रहे हैं. ये वही लोग हैं जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देती है, लेकिन असल बदलाव की नींव यही रखते हैं.

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सितंबर अहा!

सितंबर आते ही ऋतु-संधि का मधुर प्रकाश धरती पर उतर आता है। बरखा की विदाई और शरद की मुस्कान एक साथ झलकने लगती है। खेतों में धान और मक्का लहलहाते हैं, तो आँगनों में गेंदा और कमल अपनी सुगंध बिखेरते हैं। यह महीना केवल प्रकृति के बदलते रंगों का ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सवों का भी साक्षी है। पितृपक्ष की श्रद्धा और गणपति का उल्लास, दोनों एक साथ वातावरण को भक्ति और आनंद से भर देते हैं। नीलम-से गगन में पुखराज-सा सूरज चमकता है और मन के आँगन में एक नया उजास जगाता है। सचमुच, सितंबर नवजीवन का संदेश लेकर आता है।

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भोर की प्रतीक्षा…

जाने कितने जंगलों को पार करती उसकी साँसें मेरे कानों से टकराई थीं। जैसे उसकी डूबती साँसें मुझे पुकार रही हों। मैं और मेरी साँसें उस निराकार ब्रह्मांड के शरणागत थे।एक कवियित्री की आँखों में खारे अश्क़ों की गहरी तरलता भरी थी। उन अश्क़ों ने मानो किसी देव के चरण पखारने की ठान ली थी। विशालकाय, हहराती गंगा में मेरे चंद खारे आँसू भी प्रार्थना में लीन थे।

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दिल के ये जख्‍म…

यह कविता दिल के जख़्मों और दर्द को शब्दों और संगीत के रूप में ढालने की बात करती है। इसमें भाव है कि दिल अपने हर दर्द, हर टूटे सपने और हर बिखरे पल को सहेजकर उन्हें गीत, नग़मा और ग़ज़ल में बदल देता है। दुख और तकलीफ़ भी जब सुर और लय में ढलते हैं तो वे मधुर तराने बन जाते हैं। हर अक्षर एक दास्तां कहता है, हर धड़कन में संगीत छिपा है, और हर ग़म को गीत एक मीठे अहसास में बदल देता है। यह दृष्टिकोण जीवन को केवल तकलीफ़ों की कहानी न मानकर, उन तकलीफ़ों को एक सुंदर अफ़साने और मधुर यादों में ढालने की प्रेरणा देता है।

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