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तलाश

ज़िंदगी में तलाश रास्तों की नहीं, मंज़िल की होती है। इंसान कभी-कभी जीवन की भीड़ में इतना आगे बढ़ जाता है कि खुद से ही दूर हो जाता है। सुख चैन नहीं लेने देता और दुख नींद छीन लेता है, पर हम मुस्कुराते हुए सब झेलते हैं जैसे बेफ़िक्री में गुज़र रही ज़िंदगी को बस देखते जा रहे हों। असल खोज जीवनभर खुद को पाने की ही रहती है।

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ग़ज़ल

यह बात ज़ात-पात की नहीं, सोच और नज़रिया की है।हर बात की तह में जाने की आदत कभी फ़ायदा देती है, कभी सुकरात की तरह जान भी ले लेती है।
चींटी की कहानी सिखाती है कि औक़ात जानकर, शांत रहकर आगे बढ़ना ही बुद्धिमानी है। बच्चों को भी यही समझ देना चाहिए कि हर अनजानी बात पर भरोसा न करें।

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मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ… बस एक बार

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी…

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parijat - poetry - reeta - mishra

ओ पारिजात

रात गहरी हो रही है और हवा में पारिजात की सुगंध घुल रही है। मैं जागता हूँ और कविताएँ लिखता हूँ, पर शब्द अब इस खुशबू में मदहोश होने लगे हैं। मैं रंगों की सुंदरता नहीं चाहता .मुझे तो प्रेम का वही लाल रंग चाहिए जो आत्मा को महका दे। मैं चाहता हूँ कि मैं पारिजात के आँगन की उसी मिट्टी में बो दिया जाऊँ, और वहीं लगातार महकता रहूँ। इस सिंदूरी भोर में, एक स्पर्श भर से मेरी कविता फिर जीवित हो उठी है।

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जब बदरा रोया…

यह कविता प्रकृति के विनाश पर चिंता और संरक्षण का संदेश देती है। कवि दिखाता है कि जब पर्यावरण आहत होता है, तो धरती की सुंदरता और जीवन का संतुलन दोनों बिगड़ जाते हैं। वह मानव से आग्रह करता है कि जंगल बचाए, प्रदूषण रोके और संसाधनों का संयमित उपयोग करे। अंत में कवि आशा जताता है कि यदि हम प्रकृति से प्रेम करें और उसकी रक्षा करें, तो धरती फिर से हरियाली, सुगंध और आनंद से भर जाएगी।

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किसको ढोओगे

कविता सत्ता, समाज और मानवता पर गहरा प्रश्न उठाती है। कवि पूछता है. आखिर तुम किसे अपने कंधों पर उठाओगे, किसे बचाओगे? जब नैया मझधार में डूबेगी, तब कौन किसे पार लगाएगा? सत्ता की लालसा में जो सबको मिटा देने की सोच है, वही अंततः विनाश का कारण बनेगी। भारत की धरती हर धर्म, हर जाति का आंचल है. यहाँ कीचड़ में भी कमल खिलता है। लेकिन जब राजनीति भाजन का रूप लेती है, तब वही ताक़त अपने ही हाथों से हार जाती है। गरीब, सच्चे, उज्जवल मन वाले लोग पूछते हैं. क्या हर चुनाव में बस हम पर ही डोरे डालोगे, क्या सबको साथ में मारोगे?

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मन की उड़ान और उसकी बेड़ियाँ

यह कविता मन की उस द्वंद्व यात्रा को बयाँ करती है जहाँ सपनों की उड़ान और समाज के बंधन आमने-सामने खड़े हैं। कवि कहता है — मन को बाँध कर रखो, क्योंकि उसकी उड़ानें सुविधाओं और परिस्थितियों की सीमाओं से टकराती हैं।
यह रचना उस गहराई को छूती है जहाँ स्वतंत्रता की चाह और जिम्मेदारियों की जकड़न एक साथ सांस लेती हैं।

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अमन की जोत फिर जलाना है

यह जीवन बस एक बहाना है — सांसों का आना-जाना, रिश्तों का मतलब और फर्ज़ निभाने की रस्में। अमीरों की थालियाँ भरी हैं, मगर गरीब का निवाला उनसे छिन गया है। मुफ़लिसी की बातें अब किससे कही जाएं, जब ज़माना इतना बेरहम हो गया है।

आईने अब चेहरों को नहीं, दिलों को पढ़ने लगे हैं — नया चेहरा, मगर दिल वही पुराना। विज्ञान के इस दौर में इंसान चाँद पर घर बसाने की सोच रहा है, जबकि ज़मीन पर जंगल सूने और परिंदे बेघर हो गए हैं।

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“लहरों की सखी”

यह कविता आत्मसंवाद और जीवन की गहराई का प्रतीक है। कवयित्री ने लहरों को अपनी सखी — यानी आत्मीय साथी — के रूप में देखा है। लहरें यहाँ सिर्फ समुद्र की गतिशीलता नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव, भावनाओं की लय और त्मविश्वास की स्थायी धारा का प्रतीक हैं। जब कवयित्री कहती हैं “लहरों को बाहों में समेटे हुए मैं, अथाह समंदर को समेटती हुई”, तो यह अपने भीतर की असीम शक्ति और प्रेम को पहचानने की यात्रा बन जाती है।लहरें उन्हें उनकी परछाई दिखाती हैं, यानी स्वयं से मिलने का अवसर देती हैं।वे जीवन के सफर की गवाह हैं, जो कवयित्री को कभी भटकने या बहने नहीं देतीं. बल्कि उन्हें दृढ़, स्थिर और प्रेममय बनाए रखती हैं।

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नन्हीं डलिया में बताशे

यह कविता बीते दौर की उस मासूमियत और सामाजिक गर्मजोशी को याद करती है, जो अब आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खो गई है। कभी गलियों में बच्चों की डुगडुगी, उपवनों में शर्माती कलियाँ, और दोस्तों का एक पुकार पर दौड़ आना — ये सब अब दुर्लभ हो गए हैं। कवि ने भावपूर्ण शब्दों में यह अहसास जताया है कि समय के साथ रिश्तों, संवेदनाओं और सादगी की वो चमक अब धुंधला चुकी है।

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