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नन्हीं डलिया में बताशे

शशि त्यागी, प्रसिद्ध लेखिका, अमरोहा (उत्तरप्रदेश)

अब कहीं खेल-तमाशे नज़र नहीं आते,
अब ज़मीं पर भी सितारे नज़र नहीं आते।

कहीं गलियों में डुगडुगी जो बजा करती थी,
भोले-भाले से वो चेहरे नज़र नहीं आते।

अब न उपवन में कोई कच्ची कली शर्माती,
जो थे पलकों के वो पर्दे नज़र नहीं आते।

शगुन के गीतों में तन-मन भी भीग जाते थे,
नन्हीं डलिया में बताशे नज़र नहीं आते।

खबर सुनी तो चारों दोस्त दौड़े आते थे,
अब तो कंधों पर ज़नाज़े नज़र नहीं आते।

वो कहानी में जो किरदार हुआ करते थे,
अब वो दहलीज़ के शज़रे नज़र नहीं आते।

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