gulmohar

नन्हीं डलिया में बताशे

यह कविता बीते दौर की उस मासूमियत और सामाजिक गर्मजोशी को याद करती है, जो अब आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खो गई है। कभी गलियों में बच्चों की डुगडुगी, उपवनों में शर्माती कलियाँ, और दोस्तों का एक पुकार पर दौड़ आना — ये सब अब दुर्लभ हो गए हैं। कवि ने भावपूर्ण शब्दों में यह अहसास जताया है कि समय के साथ रिश्तों, संवेदनाओं और सादगी की वो चमक अब धुंधला चुकी है।

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