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विरह

निशा की नीरवता में बैठी नायिका प्रतीक्षा में लिपटी है .हवा में भीगी चाँदनी, शरीर पर ओस की बूँदें जैसे भावना का स्पर्श कर रही हों। वह प्रिय के आगमन की राह में सजी-संवरी है, मानो सावन स्वयं प्रेम का संदेश लेकर आया हो। मन में उमड़ती आशाओं से मोतियों का हार पिरोती, पलकें प्रतीक्षा की लाली से भीग उठी हैं।

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नन्हीं डलिया में बताशे

यह कविता बीते दौर की उस मासूमियत और सामाजिक गर्मजोशी को याद करती है, जो अब आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खो गई है। कभी गलियों में बच्चों की डुगडुगी, उपवनों में शर्माती कलियाँ, और दोस्तों का एक पुकार पर दौड़ आना — ये सब अब दुर्लभ हो गए हैं। कवि ने भावपूर्ण शब्दों में यह अहसास जताया है कि समय के साथ रिश्तों, संवेदनाओं और सादगी की वो चमक अब धुंधला चुकी है।

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