
अंशु जैन, प्रसिद्ध लेखिका, देहरादून
निर्बल की तुम ढाल बनना,
शक्तिहीन के लिए आँखों का पानी।
जो गिरे, उन्हें तुम उठाना,
जो रोएँ, उन्हें तुम हँसाना।
तुम बनो वो सूरज की किरण,
जो अंधेरे को पल में काट दे।
तुम बनो वो बारिश की बूंद,
जो सूखी धरती को भी हरा कर दे।
निर्बल की तुम ढाल बनना,
जो कमजोर हैं, उन्हें तुम अपनाना।
तुम बनो प्रेम का एक हाथ,
जो हर किसी को अपनाता है, बिना सवाल।
तुम बनो वो दीया,
जो जलकर भी रोशनी देता है।
निर्बल की तुम ढाल बनना
यही मानवता कहलाता है।
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