
डॉ.करुणा सिंधु
दूरियाँ आती रहती हैं,
बिल्कुल पतझर की तरह।
दूरियों और लक्ष्य के बीच
जो समय है,
स्थान है,
निर्वात है
उसकी भी एक गरिमा है।
गरिमा भी बंधी है
अपनी परंपरा से,
अपनी संस्कृति से,
अपने मूल्यों से।
दूरियाँ जीवित रहनी चाहिए
एक जीवन के मरने से लेकर
दूसरे जीवन के उगने तक।
दूरियों का सत्य
उसे जीवित रखेगा
हमेशा से, हमेशा तक।
लेखक के बारे में-
डॉ.करुणा सिंधु
हिंदी साहित्य की गंभीर अध्येता, शोधकर्ता और संवेदनशील रचनाकार हैं। आपने लखनऊ विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की तथा यूजीसी-नेट उत्तीर्ण करने के पश्चात पीएच.डी. अर्जित की। आपका शोध विषय “अज्ञेय के कथा साहित्य में परिवर्तित जीवन मूल्य” रहा है, जो आपकी गहन साहित्यिक दृष्टि और विश्लेषणात्मक क्षमता को उजागर करता है।अज्ञेय के साहित्य पर आपका अध्ययन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आपकी कविताएँ और समीक्षाएँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें आपकी लेखनी की संवेदनशीलता और वैचारिक प्रखरता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।डा. करुणा सिन्धु का साहित्य जीवन मूल्यों, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन चिंतन का सशक्त प्रतिबिंब है। वे निरंतर सृजन और शोध के माध्यम से हिंदी साहित्य की समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
ये रचनाएं भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें–
आत्मा को स्पर्श करती “स्मृति नाद”
बोगनवेलिया सी लड़की
खामोशी में छुपा प्यार
डाउन सिंड्रोम : थोड़ा अलग, लेकिन सबसे खास
