“स्त्री-मन की व्यथा और अस्तित्व की खोज: ‘अवनि से अंबर तक

साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है, पर आज यह स्त्री-मन की गहराइयों का भी प्रतिबिंब बन चुका है। ‘अवनि से अंबर तक’ में सुप्रसन्ना जी ने नारी के अंतर्द्वंद्व, पीड़ा, मातृत्व और आत्मबोध को अत्यंत संवेदनशीलता से उकेरा है। उनकी कविताएँ कभी मुस्कान बनकर खिलती हैं, तो कभी वेदना बनकर हृदय को भिगो देती हैं। यह काव्य-संकलन न केवल स्त्री-अस्तित्व की खोज है, बल्कि समाज की बदलती संवेदनाओं का सजीव दस्तावेज भी है।

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किताब “स्मृति नाद” के साथ बैठा व्यक्ति, यादों और भावनाओं में खोया हुआ

आत्मा को स्पर्श करती “स्मृति नाद”

“स्मृति नाद” अपूर्वा की ऐसी काव्य कृति है, जो स्मृतियों, रिश्तों और भावनाओं के गहरे संसार को सजीव करती है। इसमें मां, पिता और बचपन से जुड़ी अनुभूतियां इतनी सजीव हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उन्हें जीने लगता है।

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