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गहनों की बेड़ियों में बंधी हुई एक महिला, जो समाज में नारी की स्थिति और संघर्ष को दर्शाती है

अधूरी पहचान

“नारी का अस्तित्व बस इतना सा…” कविता समाज में नारी की वास्तविक स्थिति और उसके संघर्षों को उजागर करती है। यह रचना दर्शाती है कि कैसे नारी को कभी देवी तो कभी दासी बनाकर उसके अधिकारों को सीमित किया गया। यह कविता नारी सम्मान, समानता और सशक्तिकरण का गहरा संदेश देती है।

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हिन्दी दिवस बीत जाए

हिंदी स्वयं को एक दिन की रानी और भाषाओं की नानी कहती है। उसकी बहन उर्दू है, जिसके साथ उसे सदा बने रहना है। हिंदी चाहती है कि वह फूले-फले और खूब आगे बढ़े। वह आग्रह करती है कि लोग उसे सिर्फ उसके दिवस पर ही नहीं, बल्कि हर दिन याद करें, पढ़ें और लिखें।

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रिश्ते कुछ जाने कुछ अनजाने से

रिश्ते कुछ जाने-पहचाने होते हैं और कुछ अनजाने। कुछ जन्म से मिलते हैं तो कुछ समय और प्रयास से बनते हैं। ये कलियों की तरह कोमल और फूलों की तरह नाज़ुक होते हैं, लेकिन धैर्य और निभाने से लंबे समय तक टिके रहते हैं। समझ की डोर से बंधे ये रिश्ते जीवन के तूफ़ानों में भी नहीं टूटते। सुख-दुख में ये हमेशा साथ चलते हैं और एक-दूसरे को सहारा देते हैं। सच्चे रिश्ते प्रेम, समर्पण और ईमानदारी से पनपते हैं, और हर चुनौती का सामना मिलकर करते हैं। कठिनाइयों में ये हौसला बढ़ाते हैं और संघर्षों को जीत में बदल देते हैं। मन की उथल-पुथल में भी ये शांति देते हैं और आंधियों में भी अडिग खड़े रहते हैं। निराशा के क्षण आते हैं, फिर भी सच्चे रिश्ते कभी टूटते नहीं, क्योंकि इन्हें जोड़ती है भरोसे, करुणा और आपसी देखभाल की ताक़त।

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नीमच में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता कंचन बाई मेघवाल ने मधुमक्खियों के हमले से बच्चों को बचाते हुए बलिदान दिया

मानवता की मिसाल: नीमच में बच्चों को बचाते हुए महिला ने दी जान

उस सुबह आंगनवाड़ी परिसर में बच्चों की हंसी गूंज रही थी। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही मिनटों में यह जगह चीखों, अफरा-तफरी और मौत से टकराने वाली बहादुरी की गवाह बनने वाली है।
अचानक मधुमक्खियों का एक झुंड आंगनवाड़ी में खेल रहे बच्चों पर टूट पड़ा। नन्हे हाथ सिर ढकने लगे, मासूम आंखों में डर तैर गया

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जिद्दी नदी…

नदी बड़ी जिद्दी है। उसे अपने खारेपन पर अड़ जाने की जिद है, अपने अस्तित्व को खोकर भी दरिया में समा जाने की चाह है। दरिया ने कितनी ही नदियों को अपने में समा लिया, फिर भी उसकी प्यास कभी बुझी नहीं। नदी अपनी मिठास खोकर खारी हो गई, लेकिन दरिया ने कभी उसकी मिठास नहीं अपनाई। उसकी लहरें न जाने किसकी तलाश में सदा बहती रहती हैं। सब नदियाँ अपने आप को खो चुकीं, फिर भी उसकी प्यास असीम बनी रही। नदियाँ सब मिलकर ही सागर बनाती हैं। पर यह सागर अब भी किसी सीप की आशा में छलकता रहता है। और तब याद आता है कि नदी केवल जलधारा नहीं, वह माँ भी है—हम सबकी माँ। जिसने हमें यह सिखाया कि खुद को खोकर ही सब कुछ पाया जा सकता है।

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मन की आवाज़ और मुसाफ़िर दिल…

दूरी, अनिश्चितता और आत्मसंघर्ष से भरे इन भावों में एक अकेली रूह की पुकार है – जो कभी अपने प्रिय को पुकारती है, कभी जीवन की राहों से सवाल करती है, तो कभी अंधेरों में खुद को एक जुगनू की तरह जलता हुआ महसूस करती है। ये पंक्तियाँ उस मन की आवाज़ हैं जो भटकते हुए भी उम्मीद नहीं छोड़ता।

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रात के समय महल से जाते बुद्ध, पीछे यशोधरा गोद में राहुल को लिए दुख और धैर्य के साथ खड़ी हैं।

पुनर्जन्म

‘पुनर्जन्म’ एक विचारोत्तेजक कविता है जो बुद्ध के संन्यास और यशोधरा के मौन त्याग के बीच स्त्री जीवन के अनकहे संघर्ष को उजागर करती है। यह कविता समाज की दोहरी मानसिकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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प्रेम और नफ़रत

प्रेम वह शक्ति है जो जीवन को जोड़ती है और नफ़रत वह आग है जो उसे भस्म कर देती है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मुस्कान होती है; जहाँ नफ़रत होती है, वहाँ विनाश। इसलिए प्रेम बाँटिए, नफ़रत छोड़िए क्योंकि प्रेम ही सच्ची मानवता है।

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जीवन के सफर में साथ चलते लोगों और रिश्तों को दर्शाती प्रेरणादायक हिंदी कविता।

जीवन के इस मेले में

जीवन एक मेला है, जहाँ कुछ लोग साथ निभाते हैं, कुछ ठोकरें देते हैं और कुछ हमें मजबूत बनाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। यह कविता जीवन के इन्हीं रंगों और सच्चे रिश्तों का भावपूर्ण चित्रण है।

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