
वंंदना शर्मा, बिजनौर
बालकनी
हर घर में होती है
बालकनी,
एक ऐसी जगह
जहाँ से खुलती है विचारों की खिड़की,
दिखाई देता है सारा आसमां,
मिलते हैं मेरे सपनों को पंख।
बीता समय बिताने आती है एक नन्ही चिड़िया,
दूर पेड़ पर करतब दिखाती नन्ही गिलहरी।
एक ऐसी जगह
जहाँ अक्सर आती हैं महिलाएं
अपने केश संवारने,
युवा अपने फ़ोन पर समय बिताने,
बुजुर्ग अपने पोतों के किस्से सुनाने,
बच्चे आते हैं नई दुनिया को समझने।
कुछ सामान बाहर फेंकते हैं,
कुछ अंदर तोड़फोड़ करते हैं,
बालकनी से झांक-झांक कर
राहगीरों को आवाज़ लगाते हैं,
कभी बंदर, कभी चिड़िया
चिल्लाते हैं।
एक ऐसी जगह
जहाँ छिपाते हैं कुछ अपने आँसू,
मिटाते हैं कुछ अपनी उदासी,
जलाते हैं कुछ अपना क्रोध।
जब शांत हो जाता है मन,
हल्का सा मुस्काते हैं
और समय बिताते हैं
एक कप कॉफी लेकर।
समय बिताती है साथ उनके
बालकनी।
लेखिका के बारे में-
डॉ. वंदना शर्मा
हिंदी साहित्य की संवेदनशील और बहुआयामी रचनाकार हैं। बिजनौर में जन्मी डॉ. शर्मा ने हिंदी में पीएचडी के साथ विज्ञान और मास कम्युनिकेशन की शिक्षा प्राप्त की है। वे वर्तमान में आरबीडी पीजी कॉलेज, बिजनौर में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं।कविता, कहानी, यात्रा संस्मरण और समीक्षा उनकी प्रमुख लेखन विधाएँ हैं। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं, जिनमें न्यूजीलैंड की ‘भारत दर्शन’ पत्रिका भी शामिल है। उनके दो काव्य संग्रह ‘एक अजीब दास्तां’ और ‘बस यूँ ही’ अमेज़न किंडल पर प्रकाशित हैं। ऑल इंडिया रेडियो से उनके काव्य पाठ का प्रसारण भी हो चुका है। साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें ‘अर्धशती अलंकरण’ और ‘हिमाग्नि नव अंकुर साहित्यकार’ जैसे सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनका लेखन संवेदना, अनुभव और जीवन की सच्चाइयों का सहज प्रतिबिंब है।

बहुत बढ़िया 👍 सुरेश सर का धन्यवाद। बालकनी से जुड़ा अपना अनुभव आप भी बताए