बीएमसी की हार… क्योंकि मुंबई बदल रही है

बीएमसी चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह मुंबई के बदलते मतदाता और राजनीति की नई प्राथमिकताओं का संकेत है। भावनात्मक अपील से आगे बढ़कर अब शहर स्थिर शासन, विकास और स्पष्ट नेतृत्व चाहता है। यही बदलाव ठाकरे युग के अंत और नई राजनीति की शुरुआत को परिभाषित करता है।

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ऐसे न तुम रूठा करो

कुछ गिला कुछ बात कुछ शिकवा करो… जाने जां ऐसे न तुम रूठा करो।” तकरार और मोहब्बत के बीच झूलती यह पंक्तियाँ रिश्तों की उस नाज़ुक दूरी को छूती हैं जहाँ रूठना भी प्रेम का हिस्सा है।

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पुनर्जन्म…

बस से मसूरी की यात्रा पर निकली साक्षी अपने परिवार के साथ मंदिर पहुँचती है। जैसे ही वह मंदिर के अहाते में कदम रखती है, एक बूढ़ा व्यक्ति उसे देखकर दौड़ा चला आता है और कहता है — “बिटिया, तू आ गई! मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।”
सब हैरान रह जाते हैं। बूढ़ा एक पुरानी तस्वीर दिखाता है . उसमें साक्षी जैसी ही एक लड़की थी, नाम लिखा था “नूरी”। बूढ़े की आँखों में आँसू हैं, और साक्षी के मन में एक अनजाना कंपन।
क्या यह महज़ संयोग है, या सचमुच किसी पुनर्जन्म की कहानी शुरू हो चुकी है?

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आदर, मंच और धोखा

“एक दिन अचानक सरला के खाते में साढ़े तीन लाख रुपये आ जाते हैं। कोई जानकारी नहीं, कोई सूचना नहीं। थोड़ी ही देर में एक फोन आता है—‘मैं रामभरोस बोल रहा हूं, मेरी बहू से गलती से आपके खाते में पैसे आ गए हैं, लौटा दीजिए।’ सरला चौंक जाती है। क्या यह कोई साजिश है या ईमानदारी? चेक लौटाया जाता है। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकती। वह आदमी बार-बार घर आने लगता है—कभी चाय पर, कभी मोहल्ले में गाड़ी खड़ी करने के बहाने। उसके शब्दों में ‘मिशन’, ‘समाजसेवा’ और ‘फायदा’ की मीठी-मीठी बातें होती हैं।

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जन्मदिन पर परिवार के साथ खुश बच्चा, संस्कार और सादगी का संदेश

जन्मदिन की सौगात

यह बाल कविता जन्मदिन के उत्सव को केवल केक और उपहारों तक सीमित न रखकर, उसे संस्कार, सेवा और करुणा से जोड़ती है। पेड़ लगाना, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, बड़ों का सम्मान और सादगीपूर्ण जीवन जैसे मूल्य इस रचना को बच्चों के लिए शिक्षाप्रद और प्रेरक बनाते हैं।

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चूड़ियाँ

चूड़ियाँ सिर्फ़ काँच की बनी वस्तुएँ नहीं होतीं। वे माँ के हाथ उठते ही दुआओं का आशीर्वाद बन जाती हैं, बहन के राखी बाँधते ही रिश्तों की मजबूती का प्रतीक बन जाती हैं, और प्रियतम के सानिध्य में खुशियों की खनक। देखने में नाज़ुक और रंग-बिरंगी होने के बावजूद, वे जीवन की डोर को बाँधने और संबंधों को सहेजने का अद्भुत सामर्थ्य रखती हैं। चूड़ियाँ कमज़ोर नहीं होतीं—वे औरत की शक्ति, उसकी संवेदनाओं और उसके अटूट वसूलों का प्रतीक हैं।

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हनुमंती में देवभूमि नेत्र चिकित्सालय का नि:शुल्क नेत्र शिविर, 25 फरवरी को मोतियाबिंद ऑपरेशन

हनुमंती में ‘रोशनी’ का महाशिविर

हनुमंती में देवभूमि नेत्र चिकित्सालय द्वारा आयोजित नि:शुल्क नेत्र शिविर में ग्रामीणों को जांच, दवा और चश्मे वितरित किए गए। मोतियाबिंद मरीजों को 25 फरवरी को कोटद्वार में नि:शुल्क ऑपरेशन की तिथि दी गई।

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मन का अंतरिक्ष… 

यह अंश गहन रूपकों के माध्यम से मन के भीतर उमड़ते भावों और उनके क्रमिक शांत होने की प्रक्रिया को दर्शाता है।
मन के अंतरिक्ष में उल्काओं की तरह तीव्र वेग से बहते विचार और भावनाएँ कई बार टकराव और घर्षण की स्थिति पैदा करते हैं, लेकिन समय के साथ उनकी गति धीमी पड़ जाती है। यह ठीक वैसे ही है जैसे पहाड़ों और घाटियों को चीरती कोई नदी, समतल पर आकर शांत और स्निग्ध हो जाती है।
अंत में, यह रूपक जीवन के उस क्षण से जुड़ता है जब उत्साह और उमंग से भरी नई नवेली दुल्हन, अपने ही आंगन में चुपचाप प्राजक्त के फूल-सी कोमलता के साथ ठहर जाती है और भीतर गहरी शांति महसूस करती है।

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बहू नहीं कोई देवी हो

यह कहानी नारी के कर्तव्य, परिश्रम और ससुराल में सम्मान पाने की प्रेरक कहानी है। नीरा, स्वभाव से मेहनती, संवेदनशील और न्यायप्रिय, अपने सास-ससुर के प्रति समर्पित रहती है। शादी के बाद पति के ड्यूटी पर चले जाने के बावजूद वह अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होती।

कठोर व्यवहार और अन्याय के बावजूद नीरा अपने नेकनीयती और परिश्रम से अपने सास-ससुर को उचित सम्मान दिलाती है। उसके इस समर्पण और अपनापन को देखकर परिवार और समाज भी उसे आदर और सम्मान देने लगते हैं। कहानी में नारी शक्ति, सशक्तता और पारिवारिक प्रेम का संदेश प्रमुख रूप से उजागर है।

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रंगों से सजा जीवन

लाल बिंदी की ममता हो या आसमां का नीला सुकून — हर रंग जीवन को एक नई दिशा देता है। हर रंग अपनी कहानी कहता है, और इन्हीं रंगों से जीवन सच में पूर्ण बनता है।”

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