
अंजू ओझा, प्रसिद्ध लेखिका, पटना
“बड़े पापा, गंगा पार जो दस बीघा जमीन है, उसे बेच दिया जाए। पटना में हमको नया फ्लैट लेना है और रिकू को अमेरिका भी भेजना है।”
दीनानाथ त्रिपाठी अपने छोटे भाई के इकलौते बेटे राजू के लोभी और बेबाक अंदाज पर अवाक रह गए। जिस जमीन को दोनों भाई कड़ी मेहनत से दिन-रात जोड़कर खरीदे थे, वह जमीन दुधारू गाय की भाँति थी, जिस पर लगभग सौ क्विंटल अनाज होता था। इसके आमदनी से गाँव और घर को अन्न-पानी मिलता और अनाज बेचने पर लाखों रुपये की आय भी हो जाती।
“भला ऐसे कैसे बेच देते?” हृदय में क्रोध की आग भड़क उठी। लेकिन स्वयं को संयमित रखते हुए दीनानाथ जी राजू को भौंचक निगाहों से ताकते हैं। मन में यह विचार आया· यदि दीनदयाल आज जिंदा होते, तो राजू की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह इस तरह अपने ताऊजी से जमीन-जायदाद की बात करे।
“देख बचवा (बेटा), बात ये है कि इस जमीन को अभी नहीं बेचना है। इससे हमारे गाँव के घर का खर्च चलता है। तुम्हारी बड़की अम्मा भी बीमार रहती हैं, दवा-दारू की दारोमदारी है। इसी जमीन की आमदनी से हम चलते हैं। तुम तो पटना में सरकारी मुलाजिम हो ही… फिर तनख्वाह भी अच्छी खासी होगी। हम गृहस्थ आदमी ठहरे, यह जमीन चली जाएगी तो हम क्या खायेंगे क्या पियेंगे। हमारे बाऊजी ने हम दोनों भाईयों के नाम एक सा रखा था ‘दीनानाथ-दीनदयाल’। भाई की जान बसती थी इस जमीन पर। हमेशा कहते थे, भैया, ये हमारी जननी है, हमारी करमदाता है।”
राजू सकते में आ गया और तपाक से बोला- “देखिए, बड़का पापा, हम कुछ नहीं जानते। इसमें मेरा भी हिस्सा है, इसलिए आपको बेचना ही पड़ेगा। बड़े शहरों में रहने के पचासों खर्चे हैं. बिजली बिल, पेट्रोल, बच्चों की जरूरतें। आपसे कहा न कि रिकू को विदेश भेजना है।”
“सवाल ही नहीं पैदा होता कि इस मातृस्वरूपा भूमि को बेचा जाए। इसलिए चुपचाप यहाँ से चला जा,” दीनानाथ जी गरज कर बोले। “राजू, तू भूल गया ना? तुम्हारी पढ़ाई के लिए हम दोनों भाईयों ने अपनी जरूरतों में कटौती कर तुम्हें दिल्ली भेजा ताकि कामयाबी मिले, आइएएस के कोचिंग के लिए। अब कमाई हो रही है, तो भी तुम्हारे खर्चे सुरसा के मुँह की भाँति बढ़ते जा रहे हैं।”
“लेकिन बड़े पापा…” राजू का स्वर नरम पड़ा।
“पहले पटना वाले फ्लैट का हिसाब-किताब करो। आज से पंद्रह साल पहले बीस लाख में हमने खरीदा था, उसमें हम अपने हिस्से के मालगुजारी का पैसा बारह लाख लगाए थे। मेरा छोटा भाई फ्लैट का पैसा वापस कर रहा था, लेकिन हमने नहीं लिया क्योंकि राजू मेरा ही बेटा है।”
अब राजू की मनोदशा साँप-छूछुंदर जैसी हो रही थी। वर्तमान में, वह फ्लैट पटना के पॉश इलाके में है, मेन रोड पर ही। चार कमरे का बड़ा घर है, सभी कमरों में बालकनी और बाथरूम जुड़े हुए हैं। इसमें बड़े पापा ने ज्यादा पैसा लगाया है। गाँव की जमीन बेचने पर बमुश्किल बीस लाख मिलते। इससे अच्छा है कि चुपचाप खिसक लो।
“ठीक है, बड़े पापा, चलता हूँ,” कहकर राजू निकल गया।
दीनानाथ जी अपने भतीजे की चालाकी और कुटिल चाल को समझकरारा जवाब देकर संतुष्ट हुए, जिससे राजू की कुचाल निरस्त हो चुकी थी।
