
अर्पणा सिंह “अर्पी” रांची
हरेराम एक प्यारा-सा नाम और सिया उनकी समर्पित पत्नी। सुखपूर्वक दोनों का समय कट रहा था। बच्चों की शादी कर अपनी शेष ज़िंदगी एक-दूसरे के लिए समर्पित कर दी थी। पर वक़्त ने करवट बदली और सिया की तबीयत बिगड़ गई। डॉक्टरों को दिखाया और इलाज कराया। स्थिति तो सुधर गई, पर डॉक्टरों ने बताया कि कैंसर की बीमारी है और अब उनके पास ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है। जब तक ईश्वर चाहे…।
इधर हरेराम की तबीयत अचानक बिगड़ गई। पूजा करते वक़्त वे गिर गए। डॉक्टर को दिखाया गया तो उसने बताया कि दिमाग़ की एक नस दब गई है, जो उनकी याददाश्त पर असर डाल रही है। अब उन्हें समय का कोई ज्ञान भी नहीं रहता था। सुबह है या शाम, समझ ही नहीं पाते थे।
इधर पत्नी सिया की स्थिति भी बिगड़ने लगी। खाना छूट गया। बहुत मुश्किल से पूरे दिन में दो-चार चम्मच खिचड़ी खा लेती थीं। शरीर और कमज़ोर हो गया। उनकी स्थिति को देखकर उनके बच्चे (बेटा-बेटी) सब उनके पास आ गए। पता नहीं कब क्या हो जाए……।
एक दिन हरेराम की चचेरी बहन मिलने के लिए आईं तो बच्चों ने उनसे शिकायत की – “जानती हैं बुआ, पापा जी को माँ की चिंता ही नहीं है। दिनभर मोबाइल में लगे रहते हैं। कभी भी उनके विषय में नहीं पूछते। खाना खाया या नहीं, तबीयत कैसी है? इन सबसे उनको कोई मतलब ही नहीं है। दिनभर मोबाइल में यूट्यूब पर कुछ-कुछ देखते रहते हैं।”
मैं भी वहीं पर थी। उनकी बातों को सुनकर मन ही मन मुस्कुराई। पापा को बीमारी ने ऐसा बना दिया है या पत्नी के खोने की आशंका……। उन्हें कहीं न कहीं आभास हो गया है कि अब सिया नहीं रहेगी। तो शायद अपने मन को समझाने का उनका कोई तरीक़ा हो। बच्चों को कैसे समझाते कि जो जान से भी प्यारी हो, उसे ऐसे तिल-तिल कर सबसे दूर जाते हुए कैसे देख सकते!
शायद इसी मानसिक दबाव ने उन्हें इस बीमारी की तरफ़ ढकेल दिया था।
अब तो ईश्वर ही जाने! उनकी लीला से कौन अछूता रह सकता!
इन रचनाओं को भी पढ़ें
बिल्ली का अफसोस !
तलवार उठाना होगा
एक नारी की अभिव्यक्ति
जब तुम आओ…
तेरे जाने के बाद

बहुत बढ़िया 👌👌