
सुनीता सिंह सोलंकी “मीना” मुजफ्फरपुर
सड़क के डिवाइडर पर औंधी लेटी,
पूँछ से मक्खी उड़ा रही है।
आँखें आधी बंद किए,
जैसे कोई तपस्वी लग रही,
पर मन में एक खलबली।
बिल्ली सोच रही है –
क्या ज़माना आ गया?
न लोग निकलते हैं,
न अब मैं निकलती हूँ।
पहले तो गली से गुज़रूँ थी तो
चार लोग रुक जाते थे,
दो कदम पीछे हट जाते थे।
“हाय राम, बिल्ली राह काट गई!”
कहकर लौट जाते।
क्या मेरे एक कदम से,
उनका पूरा दिन बदल जाता था?
“इतनी ताकत थी मुझमें!”
और अब?
सब कार में आने-जाने लगे,
सब फोन में व्यस्त रहने लगे।
मैं बीच सड़क में लेटी रहूँ,
हॉर्न बजाकर निकल जाते हैं।
न अपशगुन रहा, न शकुन रहा।
“मैं तो बस बिल्ली रह गई।”
काश! कोई निकले,
जल्दी में हो, पूजा के लिए लेट हो रहा हो, और मैं… बस यूँ…
सामने से निकल जाऊँ।
वो पल भर रुके, माथा ठोके,
थोड़ा कोसे, थोड़ा डरे,
और मैं जीत जाऊँ।
मेरा दिन बन जाए।।
दूर से आवाज़ आई –
“म्याऊँ, चल अंदर, दूध रखा है।”
बिल्ली ने सुना, पर हिली नहीं।
दूध से पेट भरता है क्या?
रुतबे व अहंकार की बात अलग।
अफसोस ये कि,
अब लोग रास्ता काटने से भी,
नहीं डरते।
कड़वा सच यही है दोस्त –
जब दुनिया तुझे नज़रअंदाज़ करने लगे,
तो समझो, तुम्हारा ‘अपशगुन’ भी फिसल गया है।
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