
प्रतिभा इंदु भिवाड़ी (राजस्थान)
दिव्य-नियति की सूक्ष्म कल्पना
जब-जब अकुलाती है,
धरकर बेटी का स्वरूप वह
धरती पर आती है।
चंचल हिरनी सी हँसती है,
प्रेम-सुधा बरसाती,
आँगन की शोभा होती वह
घर को स्वर्ग बनाती।
बेटी के आने से घर में
रौनक छा जाती है,
सकल सिद्धियाँ चलकर घर के
अंदर आ जाती हैं।
प्यार लुटाती रहती निशि-दिन,
आ सूरज की किरणें,
उसकी पायल की रुनझुन सुन
बहते निर्झर-झरने।
धरती पर चंचल बहती वह
है गंगा की धारा,
पापा की आँखों का तारा
करती घर उजियारा।
तप्त-भूमि पर श्याम घटा बन
रिमझिम जल बरसाती,
कभी बहन बनकर बेटी
राखी की रस्म निभाती।
हुई सयानी पर घर जाकर
वह पत्नी बन जाती,
नई सृष्टि को जीवन देकर
इस धरती पर लाती।
मौन साध वो सब कुछ सहती,
कभी न कुछ कहती है,
नारी के ही कारण जग में
नई सृष्टि हँसती है।
लगता जैसे उसको सुख की
कोई नहीं जरूरत,
त्याग, तपस्या, कुर्बानी की
नारी अद्भुत मूरत।
लेकिन नारी की खातिर आ
गया समय अति भारी,
आज दमन की चक्की में
पिस रही रोज क्यों नारी?
घर में बैठे हैं दहेज के
लोभी, अत्याचारी,
कुछ सिक्कों के लिए जलाई
जाती है सुकुमारी।
घर की व्यथा कहे कितना,
बाहर भी जाना मुश्किल,
गली-गली, चौराहे पर है
नजर गड़ाए कातिल।
बदल गया है यह समाज,
कामुकता उस पर भारी,
कहीं सुरक्षित आज नहीं
घर हो या बाहर नारी।
शिक्षालय हो या देवालय,
या मस्जिद, गुरुद्वारा,
हर कोने में आज हवस का
दहक रहा अंगारा।
हर रिश्ते में आग लगी,
सारा समाज है नंगा,
दुराचार, कामुकता की हो
रही प्रवाहित गंगा।
सोया है सारा समाज अब,
उसे जगाना होगा,
इस विकृत मन के विकार को
हमें मिटाना होगा।
चाहे अपने ही पथ में लेकिन
उनसे लड़ना है,
नारी हो सर्वत्र सुरक्षित वह
समाज गढ़ना है।
इस गंदी आधुनिकता को मिल
आज बदलना होगा,
पश्चिम की देखा-देखी से
हमें निकलना होगा।
महिषासुर का तप्त लहू फिर
तुझे बहाना होगा,
जागो नारी, तुझको अब
तलवार उठाना होगा।
देख सकल अत्याचारों को
कब तक मौन रहेगी,
आखिर कब तक नारी बन
बेचारी व्यथा सहेगी?
लेखिका के बारे में–
प्रतिभा इन्दु
समकालीन हिंदी साहित्य की संवेदनशील एवं सशक्त कवयित्री हैं, जिनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, सामाजिक सरोकार और परिवर्तन की चेतना मुखर रूप में अभिव्यक्त होती है। उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद स्थित जलालपुर धई में जन्मी प्रतिभा इन्दु को साहित्यिक संस्कार अपने पिता, अंतर्राष्ट्रीय कवि स्वर्गीय श्री जवाहर इन्दु से विरासत में प्राप्त हुए। हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर एवं बी.एड. शिक्षित प्रतिभा इन्दु हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषाओं पर समान अधिकार रखती हैं।
कविता, कहानी, ग़ज़ल और गीत जैसी विविध विधाओं में उनकी सशक्त लेखनी निरंतर सक्रिय है।
प्रतिभा इन्दु की रचनाएँ अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं तथा साझा काव्य संकलनों में प्रकाशित होकर पाठकों की सराहना प्राप्त कर चुकी हैं। उनकी साहित्य साधना को अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें साहित्य सागर सम्मान (2019), भाषा सारथी सम्मान, काव्य शिखर सम्मान, पूर्वोदय शब्द श्री सम्मान, काव्य गौरव सम्मान, अटल सम्मान तथा अन्य अनेक प्रतिष्ठित अलंकरण सम्मिलित हैं।
प्रतिभा इन्दु साहित्य सृजन के साथ-साथ हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार, काव्य गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों एवं साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से समाज में सांस्कृतिक चेतना जागृत करने में भी सक्रिय हैं।
उनकी लेखनी समाज के दलित, वंचित और शोषित वर्ग की पीड़ा को स्वर देती है तथा अन्याय के विरुद्ध सजग प्रतिरोध का संदेश देती है। उनकी रचनाएँ केवल शब्द नहीं, बल्कि संवेदना, संघर्ष और आशा की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।
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