महिदपुर रोड की बहू बनी हाईकोर्ट एडवोकेट, चुनौतियों को हराकर लिखी सफलता की कहानी

खुशबू सिद्धार्थ कोचर (हाईकोर्ट एडवोकेट)

सपनों को हकीकत में बदलने की कहानी, जो बनी साहस और मेहनत की मिसाल

साक्षात्कार- सुरेश परिहार (लाइव वॉयर न्यूज, पुणे )

जब चुनौती अपने चरम पर होती है, तभी साहस और आत्मविश्वास की असली परीक्षा होती है. एक महिला अधिवक्ता और महिदपुररोड के प्रसिद्ध फर्म मनोहरलाल फकीरचंद जैन (मावावाला) की छोटी बहू खुशबू सिद्धार्थ कोचर की यह कहानी केवल पेशेवर सफलता की नहीं, बल्कि साहस, धैर्य और आत्मनिर्भरता की मिसाल है. उन्होंने समाज की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ा, डर को चुनौती दी और अपने सपनों को हकीकत में बदला. यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि शिक्षा, मेहनत और सही मार्गदर्शन से कोई भी मंज़िल दूर नहीं. आज वे हाईकोर्ट में एडवोकेट हैं तथा अपनी घर-गृहस्थी और परिवार को संभालते हुए अपने कार्य को भी बखूबी अंजाम दे रही है. उन्होंने अपनी इस यात्रा को लाइव वायर न्यूज के साथ साझा की है. प्रस्तुत है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रश्न 1: आपने अधिवक्ता बनने का निर्णय कैसे लिया? क्या यह आपका सपना था?
उत्तर: मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अधिवक्ता के रूप में कार्य करूंगी. अधिवक्ता बनना मेरा सपना नहीं था. मैंने लॉ अपनी दीदी के कहने पर किया था. अधिवक्ता बनने में मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा मेरी दीदी रही.

ये खबरें भी पढ़ें- महिदपुर रोड की बेटी आकांक्षा शर्मा का परचम
ये खबरें भी पढ़ेंडॉ. प्रभु चौधरी के निधन से साइलेंट अटैक पर बढ़ी चिंता.
ये खबरें भी पढ़ेंहोली और रंगपंचमी पर लगने वाला डोल मेला

प्रश्न 2: जब आपने कोर्ट जॉइन किया, तब आपको क्या चुनौतियाँ आईं?
उत्तर:
जब मैंने कोर्ट जॉइन किया, तब ज्यादातर अधिवक्ता पुरुष थे. मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती पुरुष अधिवक्ताओं के बीच काम करना था. मेरे सीनियर श्री महेश चन्द्र जी सोनी एवं विकास जी सोनी का बहुत सपोर्ट रहा. उन्हीं की मदद से मैं निडर होकर कोर्ट में कार्य कर पाई.

प्रश्न 3: आपका पहला केस कैसा था? आपने उसे कैसे संभाला?
उत्तर:
मेरा पहला केस एक रेप का था. जब वह केस मेरे पास आया, तो पहले मैंने मना कर दिया था. पर सर के कहने पर मैंने वह केस लिया. उस समय डर था कि मैं इतना बड़ा केस कैसे कर पाऊँगी. तब सर ने कहा कि एक अच्छा अधिवक्ता वही है जो हर समय हर तरह के केस के लिए तैयार रहे. मैंने वह केस लिया और जीता भी.

प्रश्न 4: हाई कोर्ट तक पहुंचना आपके लिए क्या मतलब रखता है?
उत्तर
: मेरा हाई कोर्ट तक जाना इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा और मेहनत के बिना कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता. शिक्षा आपको मंज़िल दिखाती है और मेहनत आपको उस मंज़िल तक ले जाती है.

प्रश्न 5: महिलाओं के लिए कानून के क्षेत्र में कौन-कौन सी बाधाएँ हैं?
उत्तर:
महिलाओं के लिए कानून के क्षेत्र में अभी भी कई बाधाएँ हैं. खासकर ग्रामीण और अविकसित क्षेत्रों में महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती, इसलिए उन्हें चुनौती का सामना करना पड़ता है.

प्रश्न 6: अधिवक्ता के रूप में कार्य करते समय संतोष कैसे मिलता है?
उत्तर:
अगर आप अपने कार्य को पूर्ण ईमानदारी और धैर्य के साथ करते हैं और अपने पक्षकार के प्रति निष्ठावान रहते हैं, तो आपका कार्य हमेशा संतोष प्रदान करता है.

प्रश्न 7: कार्य और निजी जीवन का संतुलन बनाए रखना आपके लिए कैसा रहा?
उत्तर:
मेरे लिए काम और निजी जीवन का संतुलन बनाए रखना बहुत चुनौतीपूर्ण रहा. घर, बच्चे और काम सभी को एक साथ मैनेज करना कठिन होता है. पर मेरे परिवार की मदद से मैं आज सबको साथ लेकर चल पा रही हूँ.

प्रश्न 8: आप युवा महिलाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर:
मैं बस यही कहना चाहूंगी कि अगर आप अपने जीवन में कुछ करना चाहती हैं और सेल़्फ डिपेंडेंट बनना चाहती हैं, तो थोड़ी हिम्मत करें. अगर आप ठान लें, तो आप सब कुछ कर सकती हैं.

प्रश्न 9: अधिवक्ता के रूप में सीखने के अनुभव के बारे में कुछ बताएं.
उत्तर:
कानूनी क्षेत्र में अधिवक्ता दिन प्रतिदिन सीखता है. कोई विशेष घटना न घटित होने पर भी मैं यही कहूंगी कि प्रकरण में बिना पढ़े बोर्ड पर उपस्थित होने से गलती होना स्वाभाविक है.

प्रश्न 10: युवा अधिवक्ताओं के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर:
आवश्यकता अनुसार वकालत में समय-समय पर बदलाव होते रहते हैं. मैं युवा अधिवक्ताओं से यही कहूंगी कि वे इन बदलावों को स्वीकार करें और अपने पक्षकार के साथ निष्ठावान होकर कार्य करें.

8 thoughts on “महिदपुर रोड की बहू बनी हाईकोर्ट एडवोकेट, चुनौतियों को हराकर लिखी सफलता की कहानी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *