Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
शहर की सड़क के डिवाइडर पर लेटी सोचमग्न बिल्ली, पीछे गुजरती कारें और मोबाइल में व्यस्त लोग, बदलते समय का व्यंग्यात्मक दृश्य।

बिल्ली का अफसोस !

“बिल्ली का अफसोस” एक रोचक व्यंग्य कविता है जिसमें बिल्ली के माध्यम से बदलते समाज, खत्म होते अंधविश्वास और घटते रुतबे पर मज़ेदार कटाक्ष किया गया है।

Read More
सर्दियों की ठंडी सुबह का यथार्थ दृश्य, हल्की धुंध से ढकी भारतीय गली, शॉल और ऊनी कपड़ों में लिपटे लोग, आग के पास हाथ सेंकते बुजुर्ग, चाय के कप लिए महिलाएं और जैकेट पहने बच्चे.

सर्दी का मौसम

ठंडी हवा ने जैसे पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया था. सुबह की धुंध गलियों में चुपचाप उतर आई थी और सूरज की किरणें मानो रास्ता तलाश रही थीं. लोग शॉल और स्वेटर में सिमटे, कदम धीरे-धीरे बढ़ा रहे थे. हर मोड़ पर चाय की भाप उठती दिखती थी, जो ठिठुरते बदन को थोड़ी राहत देती थी. कहीं बुजुर्ग आग के पास हाथ सेंकते नजर आते, तो कहीं बच्चे ठंड से सिकुड़ते हुए भी स्कूल की राह पकड़ते थे. यह सर्दी केवल मौसम नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चाल को थाम लेने वाली एक खामोश ताकत बन चुकी थी.

Read More

बेचारी बिल्ली

आंगन में लगे अमरूद के पेड़ को देखकर बहूरानी का मन हर रोज़ ललचा जाता था, लेकिन आंगन की खाट पर बैठी माँजी की वजह से चुपके से तोड़ पाना मुश्किल था। एक दिन माँजी गहरी नींद में थीं, तो बहू ने जल्दी से कुछ अमरूद तोड़कर खिड़की वाली मेज़ पर छुपा दिए। लेकिन इस पूरी चोरी को एक सयानी बिल्ली देख रही थी। बाद में वही बिल्ली मेज़ पर चढ़कर सारे अमरूद उठा ले गई। जैसे ही सास-बहू ने देखा, बहू तो घबरा गई, और सास ने गुस्से में “चालाक बिल्ली” को चप्पल-डंडे से खूब भगाया।

Read More