सूर्योदय की सुनहरी रोशनी में एक भारतीय माँ अपने वयस्क बच्चे के सिर पर स्नेहपूर्वक हाथ रखे खड़ी है। दोनों के चेहरे पर प्रेम, सम्मान और आत्मीयता झलक रही है। पृष्ठभूमि में हरे-भरे खेत, खिले हुए फूल और शांत आकाश दिखाई दे रहे हैं, जो मातृत्व, त्याग, संरक्षण और जीवन की प्रेरणा का प्रतीक हैं।

ममता सागर

माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, प्रेरणा और समर्पण का जीवंत स्वरूप है। यह भावपूर्ण कविता ईश्वर के सबसे अनमोल उपहार “माँ” के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करती है।

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तुम्हारे चश्मे और मेरी हसरतें…

तुम्हारी उन काजलभरी आँखों पर जब तुम चश्मा लगाती हो न…मुझे लगता है, हमारे बीच एक काँच की दीवार खड़ी हो जाती है।मैं चाहता हूँ इन आँखों में अपना अक्स साफ़ उतरते देखूँ,और ख़ुद पर रश्क कर सकूँ।

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नारी कमजोर नहीं – नारी शक्ति और आत्मसम्मान पर आधारित प्रेरक हिंदी कविता

नारी कमजोर नहीं

“नारी कमजोर नहीं” एक प्रभावशाली हिंदी कविता है जो स्त्री की शक्ति, आत्मसम्मान और साहस को उजागर करती है। यह कविता समाज को चेतावनी देती है कि नारी को कमज़ोर समझना सबसे बड़ी भूल है और सम्मान ही उसके अस्तित्व का आधार है।

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महाकाल मंदिर की संपत्ति पर सवाल, विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा ने मांगा आय और जमीन का पूरा हिसाब

महाकाल मंदिर की संपत्ति पर सियासी हलचल

उज्जैन उत्तर के विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा ने विधानसभा में प्रश्न उठाकर श्री महाकालेश्वर मंदिर की संपत्ति, दान, आय और व्यय का विस्तृत ब्योरा मांगा है. धार्मिक न्यास विभाग ने जानकारी एकत्रित किए जाने की बात कही है, जिससे मंदिर प्रबंधन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है.

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महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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स्त्री

प्रेम में डूबी स्त्री कभी नादान-सी लगती है, कभी इतनी कोमल कि जैसे स्पर्श से बिखर जाए। उसके भीतर सपनों की हलचल है. उमड़ती-घुमड़ती, तितर-बितर होती तमन्नाएँ। वह तितली-सी है, जिसे उड़ना तो है, आसमान को छूना भी है, पर उसके चारों ओर फैली दुनिया उसे फूलों के दायरे से बाहर जाने ही नहीं देती। आसमान ऊँचा है, अपने ही गर्व में अडिग; और ज़मीन पर खड़ी वह स्त्री अपने पंख फैलाने को तैयार होते हुए भी उड़ नहीं पाती।

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जीत

हार को स्वीकार करने का साहस ही सच्ची जीत की शुरुआत होता है। जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपना संयम और आत्मविश्वास बनाए रखता है, वही आगे चलकर मंज़िल तक पहुँचता है। रास्ते आज कठिन लग सकते हैं, पर यदि हौसलों से भरी कोशिश जारी रहे तो कल वही रास्ते सफलता की ओर ले जाते हैं। गिरना जीवन का स्वभाव है, पर हर बार गिरकर उठना और फिर आगे बढ़ना ही संघर्ष की असली पहचान है।

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एक भारतीय दृष्टिदिव्यांग महिला रेडियो स्टूडियो में हेडफोन पहनकर माइक्रोफोन के सामने आत्मविश्वास के साथ बोलती हुई, प्रेरणा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक

लक्ष्मी : एक आवाज़ जो बदल रही है सोच

देहरादून की शांत वादियों से उठी एक आवाज़ आज समाज की सोच को चुनौती दे रही है. यह कहानी है लक्ष्मी कीभारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टि दिव्यांग (विजुअली इम्पेयर्ड) रेडियो जॉकी, जिन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज के स्थापित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ने का साहस दिखाया.

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हम बच्चे हैं…

यह रचना युद्ध और विनाश के बीच मासूम बच्चों की दृढ़ता और आशा को सामने लाती है। चारों ओर मलबा, बारूद की गंध और प्रियजनों की लाशों का दर्द भरा माहौल है, लेकिन बच्चे अब भी खेल रहे हैं, हँस रहे हैं और जीवन को थामे हुए हैं। उनकी हँसी एक विरोधाभास है—जहाँ दुख का महासागर गहरा है, वहीं उनकी निश्छलता और दिलकश मुस्कान उम्मीद की किरण जगाती है।

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आ अब लौट चलें

अब लगता है कि चलो लौट चलते हैं, क्योंकि हर पल अब बहुत भारी हो गया है। चारों ओर एक गहरी चुप्पी छाई हुई है, और हँसी भी किसी आरी में बंध गई जैसी लगती है। हंसते-हंसते शब्द अब बोझिल लगते हैं और रिश्तों की परछाइयाँ धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही हैं। उजाला घटता जा रहा है और समय की कठिनाइयाँ हर ओर महसूस होती हैं।

हमने समय के पार जाने की कोशिश की, एक-दूसरे का हाथ थामकर, बस एक तिनके के समान छोटा सा साथ पाने की कोशिश थी। लेकिन न कोई मँझधार आई, न तूफ़ान, न डोंगी डूबी, न मौसम लड़खड़ाया—फिर भी शब्दों की तुरपाई टूट गई और अपनापन पत्थर की तरह भारी लगने लगा।

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