अदृश्य पहरा
यह कविता न बचपन और न जवानी की उस मध्यांतर अवस्था को स्वर देती है, जिसे किशोरावस्था कहा जाता है। बदलती आदतों, माता-पिता की अपेक्षाओं और सामाजिक दबावों के बीच फँसे किशोर मन की उलझन और पीड़ा को यह रचना संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त करती है।
यह कविता न बचपन और न जवानी की उस मध्यांतर अवस्था को स्वर देती है, जिसे किशोरावस्था कहा जाता है। बदलती आदतों, माता-पिता की अपेक्षाओं और सामाजिक दबावों के बीच फँसे किशोर मन की उलझन और पीड़ा को यह रचना संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त करती है।
इवा की साइकिल गायब थी और रोती हुई बच्ची बार-बार पूछ रही थी.“मम्मा, किसने ली?”
मनोरमा को तुरंत शक उसी कचरा उठाने वाले मनोज पर गया, जिसने कुछ दिन पहले साइकिल मांगने की बात कही थी। शिकायत पर मनोज को सामने लाकर खड़ा किया गया, वह केवल इतना बोल सका. “मैडम, मैंने नहीं ली… CCTV देख लीजिए।” उसी समय अरविंद का फोन आया और सच सामने आ गया.साइकिल तो उन्होंने ही मरम्मत के लिए भेजी थी।.मनोरमा के भीतर अपराधबोध भर गया. शक उसका था, गलती उसका पूर्वाग्रह।
आज का सबसे अहम सवाल यही हैक्या स्क्रीन का बढ़ता इस्तेमाल हमें उन लोगों से दूर कर रहा है, जिनसे हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं?आजकल परिवार के लोग एक ही कमरे में मौजूद होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन टाइम ज़्यादा होता है. नतीजा शारीरिक निकटता तो रहती है, पर भावनात्मक जुड़ाव धीरे-धीरे टूटने लगता है. यही स्थिति पारिवारिक समय की परिभाषा को चुनौती देती है.
मुंबई से प्रकाशित त्रैमासिक हिंदी साहित्यिक पत्रिका सृजनिकाके छठे अंक का लोकार्पण मंगलवार, 26 अगस्त को कुर्ला स्थित यूकेएस इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ एंड रिसर्च के सभागार में हुआ.
समारोह के मुख्य अतिथि हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के कार्यकारी निदेशक (नॉन-फ्यूल बिज़नेस) मुरलीकृष्ण वेंकट वाद्रेवु ने हिंदी को व्यवसाय-वृद्धि की महत्वपूर्ण सहयोगी भाषा बताते हुए अपने अनुभव साझा किए.
क्या यह सिर्फ दोस्ती है या कुछ और?
सब कुछ ठीक है, परिवार भी खुश है… फिर भी फोन की स्क्रीन पर उस ‘हरी बत्ती’ (Online Status) का इंतज़ार क्यों? 40 के पार का यह ‘नया नॉर्मल’ कई घरों की कहानी बन गया है। एक ऐसा रिश्ता जिसकी कोई मंज़िल नहीं, बस ‘फील गुड’ का नशा है।
सूरज की कोमल किरणों के साथ नया दिन, नई आशा और उमंग लेकर आता है। प्रकृति की हरियाली, कल-कल करती नदियाँ और चहकती चिड़ियाँ जीवन में प्रेरणा और ऊर्जा भरती हैं। साहस और मेहनत के साथ हर चुनौती को पार करना ही सफलता का मार्ग है।”
आज औरतें रॉकेट से लेकर एयरप्लेन तक उड़ा रही हैं, और फिर भी कुछ लोग स्कूटी चलाने पर सवाल उठाते हैं। सच तो यह है कि समस्या लड़कियों की ड्राइविंग नहीं, बल्कि कुछ लोगों की नीयत और सोच में है। हम औरतें हवा में अपने पंख फैलाकर आगे बढ़ती रहेंगी .किसी को मिर्ची लगे तो लगे।
कविता में एक अनजानी और अबोध आत्मा की पुकार है, जो जन्म लेने से पहले ही अपने जीवन की चुनौतियों और समाज में बढ़ती खतरे की भविष्यवाणी करती है। यह भावनात्मक रचना बताती है कि कैसे एक बच्चा, अपनी मासूमियत में, पहले से ही सुरक्षा और संरक्षण की लालसा रखता है, और कैसे वह अपनी सुरक्षा के लिए माता-पिता से प्रार्थना करता है कि उसे जन्म से पहले ही सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। यह कविता सामाजिक चेतना और संवेदनशीलता को उजागर करती है।
यह बाल कविता जन्मदिन के उत्सव को केवल केक और उपहारों तक सीमित न रखकर, उसे संस्कार, सेवा और करुणा से जोड़ती है। पेड़ लगाना, पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम, बड़ों का सम्मान और सादगीपूर्ण जीवन जैसे मूल्य इस रचना को बच्चों के लिए शिक्षाप्रद और प्रेरक बनाते हैं।