
सुरेखा अग्रवाल”स्वरा” उत्तरप्रदेश
देहरादून की शांत वादियों से उठी एक आवाज़ आज समाज की सोच को चुनौती दे रही है. यह कहानी है लक्ष्मी कीभारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टि दिव्यांग (विजुअली इम्पेयर्ड) रेडियो जॉकी, जिन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज के स्थापित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ने का साहस दिखाया.
संगीत में स्नातक लक्ष्मी केवल एक आर.जे. नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली स्टोरीटेलर भी हैं. रेडियो प्लेबैक इंडिया के साथ बतौर पॉडकास्टर काम कर चुकी लक्ष्मी आज अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से लाखों लोगों तक अपनी बात पहुँचा रही हैं. उनका मानना है कि कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने की ताकत रखती हैं. उनका बेबाक अंदाज़ उन्हें भीड़ से अलग बनाता हैवे सच को बिना किसी लाग-लपेट के कहने का साहस रखती हैं.
लक्ष्मी एक सवाल से हमें झकझोरती हैं क्या हमने सच में अपनी सोच बदली है? भारत ने विज्ञान, कला और तकनीक में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन मानसिकता के स्तर पर हम अब भी कई रूढ़ियों से जकड़े हुए हैं. दृष्टि दिव्यांग लोगों के प्रति समाज का नजरिया आज भी दया या आश्चर्य से भरा हुआ है. लक्ष्मी बताती हैं कि उनसे अक्सर पूछा जाता है. आप फोन कैसे चलाती हैं? या आप तैयार कैसे होती हैं? ये सवाल केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि उस गहरी अज्ञानता का प्रतीक हैं, जो उन्हें मुख्यधारा से अलग कर देती है.
मिथकों पर सीधा प्रहार
समाज में एक आम धारणा है कि दृष्टिदिव्यांग लोगों के पास कोई अद्भुत शक्ति होती है. लक्ष्मी इस सोच को सिरे से खारिज करती हैं. वे कहती हैं. अगर हमारे पास सच में कोई विशेष शक्ति होती, तो हमें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता. इसी तरह यह मान लेना कि हर दृष्टि दिव्यांग व्यक्ति संगीत में निपुण होगा, भी एक गलत धारणा है. कला न तो किसी कमी की भरपाई है, न ही किसी विशेष स्थिति की अनिवार्यता यह तो प्रतिभा और मेहनत का परिणाम है. लक्ष्मी विकलांग, दिव्यांग या स्पेशल जैसे शब्दों पर भी सवाल उठाती हैं. उनका मानना है कि नाम बदलने से वास्तविकता नहीं बदलती.
वे एक सरल उदाहरण देती हैं जब कोई व्यक्ति वृद्ध होता है, तो उसकी क्षमताएँ कम हो जाती हैं, लेकिन हम उसे डिसेबल्ड नहीं कहते. क्योंकि हम उसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानते हैं. तो फिर दृष्टिबाधिता को भी उसी सामान्यता से क्यों नहीं देखा जा सकता?उनके अनुसार, असली बदलाव शब्दों में नहीं, बल्कि नजरिए में होना चाहिए.
सच्चा इनक्लूजन क्या है?
लक्ष्मी के अनुसार, समावेश का अर्थ केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि समान अवसर है. इसके लिए वे कुछ जरूरी पहलुओं पर जोर देती हैं.
तकनीकी सशक्तिकरण: JAWS और NVDA जैसे जैसे स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर हर दृष्टिदिव्यांग व्यक्ति के लिए सुलभ होने चाहिए.
सकारात्मक प्रस्तुति: मीडिया और विज्ञापनों में दृष्टिदिव्यांगों को सक्षम और सामान्य व्यक्तियों की तरह दिखाया जाए.
समान व्यवहार: उन्हें अलग या विशेषमानकर व्यवहार करने के बजाय, सामान्य नागरिक की तरह देखा जाए.
अपनी आवाज़ खुद बनें
लक्ष्मी का संदेश स्पष्ट और सशक्त है जब तक आप अपनी बात खुद नहीं रखेंगे, कोई आपको समझ नहीं पाएगा.
वे आत्मविश्वास को सबसे बड़ा हथियार मानती हैं, जो किसी भी सामाजिक बंधन को तोड़ सकता है. उनकी यात्रा केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है. यह हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो अपनी कमजोरी को अपनी ताकत में बदलने का साहस रखता है.
