रूबरू एहसास

खिड़की के पास खड़ा एक व्यक्ति, आंखों में आंसू और दूर किसी की याद में डूबा हुआ भावनात्मक दृश्य

विजया डालमिया, हैदराबाद

एक अरसा हुआ, उनसे रूबरू हुए
हर एक लम्हे में वो, गुफ्तगू कर गया …

सांसें होने लगी, खास मेरी
एहसासों में शामिल वो, जब हो गया…

लाख चाहा अल्फाजों को, रोकना मगर
आँखों से वो खुद को ,बयां कर गया…

जीने मरने में फर्क, नहीं है कोई
हो गया जिंदा वो जो था मर गया…

शब्द देके मुझे, निशब्द किया
जहीन और जरफ बन, वो छुप गया…

मौका ए परस्त से ,पूछेंगे कभी
क्या हुआ जो वार पे, वार कर गया….

गुमनामी का अंधेरा, बंटा या छंटा
शख्सियत बनके जो, रोशन हो गया…

गिला और दुआ में, रहता वही
दर्द बनकर दवा, अपना काम कर गया…

बात इतनी थी ना, समझा ये दिल
हमने बेहतर लिखा जिस्म जब थक गया…



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