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एक भारतीय दृष्टिदिव्यांग महिला रेडियो स्टूडियो में हेडफोन पहनकर माइक्रोफोन के सामने आत्मविश्वास के साथ बोलती हुई, प्रेरणा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक

लक्ष्मी : एक आवाज़ जो बदल रही है सोच

देहरादून की शांत वादियों से उठी एक आवाज़ आज समाज की सोच को चुनौती दे रही है. यह कहानी है लक्ष्मी कीभारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टि दिव्यांग (विजुअली इम्पेयर्ड) रेडियो जॉकी, जिन्होंने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज के स्थापित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ने का साहस दिखाया.

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ना रोक खुद को अब…

हर कठिनाई से लड़ने की ताकत रखती है तू, तो फिर सुन स्त्री, अब अपने स्त्री होने पर शर्म नहीं, गर्व किया कर। जहाँ मन लगे, वहाँ दिल लगाना तेरा अधिकार है, और आईने में मुस्कुराकर खुद को पहचानना भी। तू सिर्फ जिम्मेदारियों में नहीं, हक़ में भी जी सकती है – खुद से प्यार कर, खुद को सजा, और दुनिया को दिखा कि तू क्या है।”

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“जहां से मैं शुरू हुई, वहां मैं नहीं रुकी”

प्रभा ने जीवन भर त्याग और समर्पण सीखा, लेकिन जब अपनी बेटी की बातों ने उसे आईना दिखाया, तो उसने खुद के अस्तित्व की तलाश शुरू की। आज, वह सिर्फ किसी की पत्नी या बहू नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और एक सफल स्त्री है — अपनी पहचान के साथ।”

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