
रेखा हजारिका, प्रसिद्ध असमिया लेखिका, लखीमपुर (आसाम)
उस वक़्त की कहानी थी,
कुछ भीगे पलों की रवानी थी।
प्यार में पागल वह लड़की,
फूलों की ख़ामोश हँसी से
अपने बाल सँवार लिया करती थी।
एक छोटी-सी शीशी में
ख़ुद को देर तक निहारा करती थी।
आँखों में काजल का ठहराव,
गालों पर दूधिया उजास
शीशे ने भी कह दिया था,
“तेरी चाल में है कोई ख़ास बात।”
“कितनी सुंदर हो तुम,”
उसने हँसकर कहा था कभी
याद आते ही आज भी
वह बातों से नहीं, लाज से भर जाती है अभी।
हथेलियों में उसकी ऊष्मा थी,
नज़रों में अनकहा इकरार
काजल-भरी उन आँखों को
उसने जी भरकर निहारा था उस बार।
बरस बीत गए…
पर लगता है जैसे कल की ही बात है।
रोज़ बस स्टॉप पर खड़ी वह,
होठों पर उम्मीद की मुस्कान लिए,
हर आती बस को
रुक-रुक कर देखती है।
सैयाँजी ने वादा किया था
लौट आने का…
और वह आज भी
उसी वादे की साँसों में
ज़िंदगी जीती है।
