
मेघा अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, नागपुर (महाराष्ट्र)
करते हैं यह भूल सभी कोमल हूँ, कमजोर नहीं।
मत नज़रें मुझ पर गड़ा, सबला हूँ मैं, अबला नहीं।
नारी को देखेगा गंदी नज़रों से तो,
नज़रें तेरी नोच लूँगी।
यह तन भले मांस का टुकड़ा है,
तुझे चिथड़ों में तोड़ दूँगी।
मेरे मन में चिंगारी है,
हवा देने की भूल न करना,
वरना शोला बनकर मैं
तुझे राख में भस्म कर दूँगी।
करते हैं यह भूल सभी कोमल हूँ, कमजोर नहीं।
मत नज़रें मुझ पर गड़ा, सबला हूँ मैं, अबला नहीं।
वासनामय तेरी दृष्टि को
चार भागों में बाँट दूँगी।
जब-जब देखेगा तू मुझको,
कटारी बन तुझे काट दूँगी।
शूलों पर अगर चलना है मुझको,
तो दर्द तुझे भी मैं दूँगी।
ओछी तेरी नियत को भी
मैं जड़ से ही उखाड़ दूँगी।
करते हैं यह भूल सभी कोमल हूँ, कमजोर नहीं।
मत नज़रें मुझ पर गड़ा, सबला हूँ मैं, अबला नहीं।
कोशिश मत करना छूने की,
तुझे आग बनकर जला दूँगी।
जो आया पास मेरे तो,
सिंहनी बनकर फाड़ दूँगी।
नारी को सम्मान तू दे,
मत करना अपमान कभी,
वरना ज्वाला बन उठूँगी मैं,
और तेरे अहं को मात दूँगी।
करते हैं यह भूल सभी कोमल हूँ, कमजोर नहीं।
मत नज़रें मुझ पर गड़ा, सबला हूँ मैं, अबला नहीं।
सबला हूँ मैं, अबला नहीं।

Kmal ki rachna