कौन हैं वो..?

लाचार माँ: बुढ़ापे की दहलीज पर अपनेपन को तरसती एक माँ

मीनू वर्मा, नोएडा (उत्तरप्रदेश)

बुढ़ापे की दहलीज पर,
अपनेपन के लिए तरसती,
न जाने कौन हैं वो?
थक चुकी निगाहों से,
अपने अस्तित्व को तलाशती,
न जाने कौन हैं वो?
अकेली बिल्कुल अकेली,
सड़क के किनारे पड़ी,
किसी निर्जीव वस्तु की तरह,
न जाने कौन हैं वो?
कभी अपनों को,
ममतामई छाँव देने वाली,
आज गैरों से दया की उम्मीद बाँधती,
न जाने कौन हैं वो?
तमाम उम्र फिक्र मंद रहकर,
अपनों को सँवारने वाली,
ख़ुद को भुलाकर कभी अपनों की,
परवाह में लीन रहने वाली,
न जाने कौन हैं वो?
नजरअंदाज कर अपनी,
सारी इच्छाएँ..
ताउम्र मुस्कुरा कर,
हर दर्द सहने वाली,
न जाने कौन हैं वो?
रू-ब-रू होना नहीं चाहता है,
अब जिसके कोई,
जिसके साए से भी आज,
दूर रहना चाहते हैं सभी,
फुर्सत का वक्त भी, जिसे..
देना नहीं चाहते उनके अपने तक भी,
उजाले के बावजूद भी जिसे
पहचानना चाहता हैं नहीं कोई,
आखिर कौन है और किसकी है,
वो लाचार माँ?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *